Gobind Ramayana in Hindi
ੴ वाहिगुरू जी की फतह ॥
अथ बीसवां राम अवतार कथनं ॥
चौपई ॥ ॥ अब मै कहो राम अवतारा ॥ ॥ जैस जगत मो करा पसारा ॥ ॥ बहुतु काल बीतत भयो जबै ॥ ॥ ॥ असुरन बंस प्रगट भयो तबै ॥१॥ ॥ असुर लगे बहु करै बिखाधा ॥ ॥ किनहूं न तिनै तनक मै साधा ॥ ॥ सकल देव इकठे तब भए ॥ ॥ ॥ छीर समुंद्र जह थो तिह गए ॥२॥ ॥ बहु चिर बसत भए तिह ठामा ॥ ॥ बिसन सहित ब्रहमा जिह नामा ॥ ॥ बार बार ही दुखत पुकारत ॥ ॥ ॥ कान परी कल के धुनि आरत ॥३॥ ॥ तोटक छंद ॥ ॥ बिसनादक देव लेख बिमनं ॥ ॥ म्रिद हास करी कर काल धुनं ॥ ॥ अवतार धरो रघुनाथ हरं ॥ ॥ ॥ चिर राज करो सुख सो अवधं ॥४॥ ॥ बिसनेस धुणं सुण ब्रहम मुखं ॥ ॥ अब सुध चली रघुबंस कथं ॥ ॥ जु पै छोर कथा कवि याह रढै ॥ ॥ ॥ इन बातन को इक ग्रंथ बढै ॥५॥ ॥ तिह ते कही थोरीऐ बीन कथा ॥ ॥ बलि त्वै उपजी बुध मधि जथा ॥ ॥ जह भूलि भई हम ते लहीयो ॥ ॥ ॥ सु कबो तह अच्छ्र बना कहीयो ॥६॥ ॥ रघु राज भयो रघु बंस मणं ॥ ॥ जिह राज करयो पुर अउध घणं ॥ ॥ सोऊ काल जिणयो न्रिपराज जबं ॥ ॥ ॥ भूअ राज करयो अज राज तबं ॥७॥ ॥ अज राज हणयो जब काल बली ॥ ॥ सु न्रिपत कथा दसरथ चली ॥ ॥ चिर राज करो सुख सों अवधं ॥ ॥ ॥ म्रिग मार बिहार बणं सु प्रभं ॥८॥ ॥ जग धरम कथा प्रचुरी तब ते ॥ ॥ सुमित्रेस महीप भयो जब ते ॥ ॥ दिन रैण बनैसन बीच फिरै ॥ ॥ ॥ म्रिग राज करी म्रिग नेत हरै ॥९॥ ॥ इह भांति कथा उह ठौर भई ॥ ॥ अब राम जया पर बात गई ॥ ॥ कुहड़ाम जहां सुनीऐ सहरं ॥ ॥ ॥ तह कौसल राज न्रिपेस बरं ॥१०॥ ॥ उपजी तह धाम सुता कुसलं ॥ ॥ जिह जीत लई ससि अंग कलं ॥ ॥ जब ही सुधि पाइ सुय्मब्र करिओ ॥ ॥ ॥ अवधेस नरेसहि चीन बरिओ ॥११॥ ॥ पुनि सैन समित्र नरेस बरं ॥ ॥ जिह जुध लयो मद्र देस हरं ॥ ॥ सुमित्रा तिह धाम भई दुहिता ॥ ॥ ॥ जिह जीत लई सस सूर प्रभा ॥१२॥ ॥ सोऊ बारि सबुध भई जब ही ॥ ॥ अवधेसह चीन बरिओ तब ही ॥ ॥ गन याह भयो कसटुआर न्रिपं ॥ ॥ ॥ जिह केकई धाम सु तासु प्रभं ॥१३॥ ॥ इन ते ग्रह मो सुत जउन थीओ ॥ ॥ तब बैठ नरेस बिचार कीओ ॥ ॥ तब केकई नार बिचार करी ॥ ॥ ॥ जिह ते ससि सूरज सोभ धरी ॥१४॥
॥ तिह बयाहत मांग लए दु बरं ॥ ॥ जिह ते अवधेस के प्राण हरं ॥ ॥ समझी न नरेसर बात हीए ॥ ॥ ॥ तब ही तह को बर दोइ दीए ॥१५॥ ॥ पुन देव अदेवन जुध परो ॥ ॥ जह जुध घणो न्रिप आप करो ॥ ॥ हत सारथी सयंदन नार हकियो ॥ ॥ ॥ यह कौतक देख नरेस चकियो ॥१६॥ ॥ पुन रीझ दए दोऊ तीअ बरं ॥ ॥ चित मो सु बिचार कछू न करं ॥ ॥ कही नाटक मध चरित्र कथा ॥ ॥ ॥ जय दीन सुरेस नरेस जथा ॥१७॥ ॥ अरि जीति अनेक अनेक बिधं ॥ ॥ सभ काज नरेस्वर कीन सिधं ॥ ॥ दिन रैण बिहारत मधि बणं ॥ ॥ ॥ जल लैन दिजाइ तहां स्रवणं ॥१८॥ ॥ पित मात तजे दोऊ अंध भूयं ॥ ॥ गहि पात्र चलियो जलु लैन सुयं ॥ ॥ मुनि नो दित काल सिधार तहां ॥ ॥ ॥ न्रिप बैठ पतऊवन बांध जहां ॥१९॥ ॥ भभकंत घटं अति नादि हुअं ॥ ॥ धुनि कान परी अज राज सुअं ॥ ॥ गहि पाण सु बाणहि तान धनं ॥ ॥ ॥ म्रिग जाण दिजं सर सुध हनं ॥२०॥ ॥ गिर गयो सु लगे सर सुध मुनं ॥ ॥ निसरी मुख ते हहकार धुनं ॥ ॥ म्रिगनात कहा न्रिप जाइ लहै ॥ ॥ ॥ दिज देख दोऊ कर दांत गहै ॥२१॥ ॥ सरवण बाचि ॥ ॥ कछु प्रान रहे तिह मध तनं ॥ ॥ निकरंत कहा जीअ बिप्र न्रिपं ॥ ॥ मुर तात रु मात न्रिच्छ परे ॥ ॥ ॥ तिह पान पिआइ न्रिपाध मरे ॥२२॥ ॥ पाधड़ी छंद ॥ ॥ बिन च्छ भूप दोऊ तात मात ॥ ॥ तिन देह पान तुह कहौं बात ॥ ॥ मम कथा न तिन कहीयो प्रबीन ॥ ॥ ॥ सुनि मरयो पुत्र तेऊ होहि छीन ॥२३॥ ॥ इह भांत जबै दिज कहै बैन ॥ ॥ जल सुनत भूप चुऐ चले नैन ॥ ॥ ध्रिग मोह जिन सु कीनो कुकरम ॥ ॥ ॥ हति भयो राज अरु गयो धरम ॥२४॥ ॥ जब लयो भूप तिह सर निकार ॥ ॥ तब तजे प्राण मुन बर उदार ॥ ॥ पुन भयो राव मन मै उदास ॥ ॥ ॥ ग्रिह पलट जान की तजी आस ॥२५॥ ॥ जीअ ठटी कि धारो जोग भेस ॥ ॥ कहूं बसौ जाइ बनि तिआगि देस ॥ ॥ किह काज मोर यह राज साज ॥ ॥ ॥ दिज मारि कीयो जिन अस कुकाज ॥२६॥ ॥ इह भांत कही पुनि न्रिप प्रबीन ॥ ॥ सभ जगति काल करमै अधीन ॥ ॥ अब करो कछू ऐसो उपाइ ॥ ॥ ॥ जा ते सु बचै तिह तात माइ ॥२७॥ ॥ भरि लयो कु्मभ सिर पै उठाइ ॥ ॥ तह गयो जहां दिज तात माइ ॥ ॥ जब गयो निकट तिन के सु धार ॥ ॥ ॥ तब लखी दुहूं तिह पाव चार ॥२८॥
॥ दिज बाच राजा सों ॥ ॥ पाधड़ी छंद ॥ ॥ कह कहो पुत्र लागी अवार ॥ ॥ सुनि रहिओ मोन भूपत उदार ॥ ॥ फिरि कहयो काहि बोलत न पूत ॥ ॥ ॥ चुप रहे राज लहि कै कसूत ॥२९॥ ॥ न्रिप दीओ पान तिह पान जाइ ॥ ॥ चकि रहे अंध तिह कर छुहाइ ॥ ॥ कर कोप कहियो तू आहि कोइ ॥ ॥ ॥ इम सुनत सबद न्रिप दयो रोइ ॥३०॥ ॥ राजा बाच दिज सों ॥ ॥ पाधड़ी छंद ॥ ॥ हउ पुत्र घात तव ब्रहमणेस ॥ ॥ जिह हनियो स्रवण तव सुत सुदेस ॥ ॥ मै परयो सरण दसरथ राइ ॥ ॥ ॥ चाहो सु करो मोहि बिप आइ ॥३१॥ ॥ राखै तु राखु मारै तु मारु ॥ ॥ मै परो सरण तुमरै दुआरि ॥ ॥ तब कही किनो दसरथ राइ ॥ ॥ ॥ बहु कासट अगन द्वै देइ मंगाइ ॥३२॥ ॥ तब लीयो अधिक कासट मंगाइ ॥ ॥ चड़ बैठे तहां सल्ह कउ बनाइ ॥ ॥ चहूं ओर दई जुआला जगाइ ॥ ॥ ॥ दिज जान गई पावक सिराइ ॥३३॥ ॥ तब जोग अगनि तन ते उप्राज ॥ ॥ दुहूं मरन जरन को सजियो साज ॥ ॥ ते भसम भए तिह बीच आप ॥ ॥ ॥ तिह कोप दुहूं न्रिप दीयो स्राप ॥३४॥ ॥ दिज बाच राजा सों ॥ ॥ पाधड़ी छंद ॥ ॥ जिम तजे प्राण हम सुति बिछोहि ॥ ॥ तिम लगो स्राप सुन भूप तोहि ॥ ॥ इम भाख जरयो दिज सहित नारि ॥ ॥ ॥ तज देह कीयो सुरपुर बिहार ॥३५॥ ॥ राजा बाच ॥ ॥ पाधड़ी छंद ॥ ॥ तब चही भूप हउं जरों आज ॥ ॥ कै अतिथि होऊं तज राज साज ॥ ॥ कै ग्रहि जै कै करहों उचार ॥ ॥ ॥ मै दिज आयो निज कर संघार ॥३६॥ ॥ देव बानी बाच ॥ ॥ पाधड़ी छंद ॥ ॥ तब भई देव बानी बनाइ ॥ ॥ जिन करो दुख दसरथ राइ ॥ ॥ तव धाम होहिगे पुत्र बिसन ॥ ॥ ॥ सभ काज आज सिध भए जिसन ॥३७॥ ॥ ह्वै है सु नाम रामावतार ॥ ॥ कर है सु सकल जग को उधार ॥ ॥ कर है सु तनक मै दुसट नास ॥ ॥ ॥ इह भांत कीरत कर है प्रकास ॥३८॥ ॥ नराज छंद ॥ ॥ नचिंत भूप चिंत धाम राम राइ आइ हैं ॥ ॥ दुरंत दुसट जीत कै सु जैत पत्र पाइ हैं ॥ ॥ अखरब गरब जे भरे सु सरब गरब घाल हैं ॥ ॥ ॥ फिराइ छत्र सीस पै छतीस छोण पाल हैं ॥३९॥ ॥ अखंड खंड खंड कै अडंड डंड दंड हैं ॥ ॥ अजीत जीत जीत कै बिसेख राज मंड हैं ॥ ॥ कलंक दूर कै सभै निसंक लंक घाइ हैं ॥ ॥ ॥ सु जीत बाह बीस गरब ईस को मिटाइ हैं ॥४०॥
॥ सिधार भूप धाम को इतो न सोक को धरो ॥ ॥ बुलाइ बिप छोण के अर्मभ जग को करो ॥ ॥ सुणंत बैण राव राजधानीऐ सिधारीअं ॥ ॥ ॥ बुलाइ कै बसिसट राजसूइ को सुधारीअं ॥४१॥ ॥ अनेक देस देस के नरेस बोल कै लए ॥ ॥ दिजेस बेस बेस के छितेस धाम आ गए ॥ ॥ अनेक भांत मान कै दिवान बोल कै लए ॥ ॥ ॥ सु जग राजसूइ को अर्मभ ता दिना भए ॥४२॥ ॥ सु पादि अरघ आसनं अनेक धूप दीप कै ॥ ॥ पखारि पाइ ब्रहमणं प्रद्छणा बिसेख दै ॥ ॥ करोर कोर द्छना दिजेक एक कउ दई ॥ ॥ ॥ सु जग राजसूइ की अर्मभ ता दिना भई ॥४३॥ ॥ नटेस देस देस के अनेक गीत गावही ॥ ॥ अनंत दान मान लै बिसेख सोभ पावही ॥ ॥ प्रसंनि लोग जे भए सु जात कउन ते कहे ॥ ॥ ॥ बिमान आसमान के पछान मोन हुऐ रहे ॥४४॥ ॥ हुती जिती अपच्छरा चली सुवरग छोर कै ॥ ॥ बिसेख हाइ भाइ कै नचंत अंग मोर कै ॥ ॥ बिअंत भूप रीझही अनंत दान पावहीं ॥ ॥ ॥ बिलोकि अच्छरान को अपच्छरा लजावहीं ॥४५॥ ॥ अनंत दान मान दै बुलाइ सूरमा लए ॥ ॥ दुरंत सैन संग दै दसो दिसा पठै दए ॥ ॥ नरेस देस देस के न्रिपेस पाइ पारीअं ॥ ॥ ॥ महेस जीत कै सभै सु छत्रपत्र ढारीअं ॥४६॥ ॥ रूआमल छंद ॥ ॥ जीत जीत न्रिपं नरेसुर सत्र मित्र बुलाइ ॥ ॥ बिप्र आदि बिसिसट ते लै कै सभै रिखराइ ॥ ॥ क्रुध जुध करे घने अवगाहि गाहि सुदेस ॥ ॥ ॥ आन आन अवधेस के पग लागीअं अवनेस ॥४७॥ ॥ भांति भांतिन दै लए सनमान आन न्रिपाल ॥ ॥ अरब खरबन दरब दै गज राज बाज बिसाल ॥ ॥ हीर चीरन को सकै गन जटत जीन जराइ ॥ ॥ ॥ भाउ भूखन को कहै बिध ते न जात बताइ ॥४८॥ ॥ पसम बसत्र पट्मबरादिक दीए भूपन भूप ॥ ॥ रूप अरूप सरूप सोभित कउन इंद्र करूपु ॥ ॥ दुसट पुसट त्रसै सभै थरहरयो सुनि गिरराइ ॥ ॥ ॥ काटि काटिन दै मुझै न्रिप बांटि बांटि लुटाइ ॥४९॥ ॥ बेद धुनि करि कै सभै दिज कीअस जग अर्मभ ॥ ॥ भांति भांति बुलाइ होमत रित जान अस्मभ ॥ ॥ अधिक मुनिबर जउ कीयो बिध पूरब होम बनाइ ॥ ॥ ॥ जग कुंडहु ते उठे तब जग पुरख अकुलाइ ॥५०॥ ॥ खीर पात्र कढाइ लै करि दीन न्रिप के आन ॥ ॥ भूप पाइ प्रसंनि भयो जिमु दारदी लै दान ॥
॥ चत्र भाग करयो तिसै निज पान लै न्रिपराइ ॥ ॥ ॥ एक एक दयो दुहू त्रीअ एक को दुइ भाइ ॥५१॥ ॥ गरभवंत भई त्रियो त्रिय छीर को करि पान ॥ ॥ ताहि राखत भी भलो दस दोइ मास प्रमान ॥ ॥ मास त्रिउदसमो चढयो तब संतन हेत उधार ॥ ॥ ॥ रावणारि प्रगट भए जग आन राम अवतार ॥५२॥ ॥ भरथ लछमन सत्रुघन पुनि भए तीन कुमार ॥ ॥ भांति भांतिन बाजीयं न्रिप राज बाजन दुआर ॥ ॥ पाइ लाग बुलाइ बिपन दीन दान दुरंति ॥ ॥ ॥ सत्रु नासत होहिगे सुख पाइ हैं सभ संत ॥५३॥ ॥ लाल जाल प्रवेसट रिखबर बाज राज समाज ॥ ॥ भांति भांतिन देत भयो दिज पतन को न्रिपराज ॥ ॥ देस अउर बिदेस भीतर ठउर ठउर महंत ॥ ॥ ॥ नाच नाच उठे सभै जनु आज लाग बसंत ॥५४॥ ॥ किंकणीन के जाल भूखति बाज अउ गजराज ॥ ॥ साज साज दए दिजेसन आज कउसल राज ॥ ॥ रंक राज भए घने तह रंक राजन जैस ॥ ॥ ॥ राम जनमत भयो उतसव अउध पुर मै ऐस ॥५५॥ ॥ दुंदभ अउर म्रिदंग तूर तुरंग तान अनेक ॥ ॥ बीन बीन बजंत छीन प्रबीन बीन बिसेख ॥ ॥ झांझ बार तरंग तुरही भेरनादि नियान ॥ ॥ ॥ मोहि मोहि गिरे धरा पर सरब बयोम बिवान ॥५६॥ ॥ जत्र तत्र बिदेस देसन होत मंगलचार ॥ ॥ बैठि बैठि करै लगे सब बिप्र बेद बिचार ॥ ॥ धूप दीप महीप ग्रेह सनेह देत बनाइ ॥ ॥ ॥ फूलि फूलि फिरै सभै गण देव देवन राइ ॥५७॥ ॥ आज काज भए सबै इह भांति बोलत बैन ॥ ॥ भूम भूर उठी जयत धुन बाज बाजत गैन ॥ ॥ ऐन ऐन धुजा बधी सभ बाट बंदनवार ॥ ॥ ॥ लीप लीप धरे मलयागर हाट पाट बजार ॥५८॥ ॥ साजि साजि तुरंग कंचन देत दीनन दान ॥ ॥ मसत हसति दए अनेकन इंद्र दुरद समान ॥ ॥ किंकणी के जाल भूखत दए सयंदन सुध ॥ ॥ ॥ गाइनन के पुर मनो इह भांति आवत बुध ॥५९॥ ॥ बाज साज दए इते जिह पाईऐ नही पार ॥ ॥ दयोस दयोस बढै लगयो रनधीर रामवतार ॥ ॥ ससत्र सासत्रन की सभै बिध दीन ताहि सुधार ॥ ॥ ॥ असट दयोसन मो गए लै सरब रामकुमार ॥६०॥ ॥ बान पान कमान लै बिहरंत सरजू तीर ॥ ॥ पीत पीत पिछोर कारन धीर चारहुं बीर ॥ ॥ बेख बेख न्रिपान के बिहरंत बालक संग ॥ ॥ ॥ भांति भांतन के धरे तन चीर रंग तरंग ॥६१॥
॥ ऐसि बात भई इतै उह ओर बिस्वामित्र ॥ ॥ जग को सु करियो अर्मभन तोखनारथ पित्र ॥ ॥ होम की लै बासना उठ धात दैत दुरंत ॥ ॥ ॥ लूट खात सबै समगरी मार कूटि महंत ॥६२॥ ॥ लूट खातह विखय जे तिन पै कछू न बसाइ ॥ ॥ ताक अउधह आइयो तब रोस कै मुनि राइ ॥ ॥ आइ भूपत कउ कहा सुत देहु मो कउ राम ॥ ॥ ॥ नात्र तो कउ भसम करि हउ आज ही इह ठाम ॥६३॥ ॥ कोप देखि मुनीस कउ न्रिप पूत ता संग दीन ॥ ॥ जग मंडल कउ चलयो लै ताहि संगि प्रबीन ॥ ॥ एक मारग दूर है इक नीअर है सुनि राम ॥ ॥ ॥ राह मारत राछसी जिह तारका गनि नाम ॥६४॥ ॥ जउन मारग तीर है तिह राह चालहु आज ॥ ॥ चित्त चिंत न कीजीऐ दिव देव के हैं काज ॥ ॥ बाटि चापै जात हैं तब लउ निसाचर आन ॥ ॥ ॥ जाहुगे कत राम कहि मगि रोकियो तजि कान ॥६५॥ ॥ देखि राम निसाचरी गहि लीन बान कमान ॥ ॥ भाल मध प्रहारियो सुर तानि कान प्रमान ॥ ॥ बान लागत ही गिरी बिस्मभारु देहि बिसाल ॥ ॥ ॥ हाथि स्री रघुनाथ के भयो पापनी को काल ॥६६॥ ॥ ऐस ताहि संघार कै कर जग मंडल मंड ॥ ॥ आइगे तब लउ निसाचर दीह देइ प्रचंड ॥ ॥ भाजि भाजि चले सभै रिख ठांढ भे हठि राम ॥ ॥ ॥ जुध क्रुध करियो तिहूं तिह ठउर सोरह जाम ॥६७॥ ॥ मार मार पुकार दानव ससत्र असत्र स्मभारि ॥ ॥ बान पान कमान कउ धरि तबर तिच्छ कुठारि ॥ ॥ घोरि घोरि दसो दिसा नहि सूरबीर प्रमाथ ॥ ॥ ॥ आइ कै जूझे सबै रण राम एकल साथ ॥६८॥ ॥ रसावल छंद ॥ ॥ रणं पेखि रामं ॥ ॥ धुजं धरम धामं ॥ ॥ चहूं ओर ढूके ॥ ॥ ॥ मुखं मार कूके ॥६९॥ ॥ बजे घोर बाजे ॥ ॥ धुणं मेघ लाजे ॥ ॥ झंडा गड गाड़े ॥ ॥ ॥ मंडे बैर बाड़े ॥७०॥ ॥ कड़के कमाणं ॥ ॥ झड़के क्रिपाणं ॥ ॥ ढला ढुक ढालै ॥ ॥ ॥ चली पीत पालै ॥७१॥ ॥ रणं रंग रत्ते ॥ ॥ मनो मल मत्ते ॥ ॥ सरं धार बरखे ॥ ॥ ॥ महिखुआस करखै ॥७२॥ ॥ करी बान बरखा ॥ ॥ सुणे जीत करखा ॥ ॥ सुबाहं मरीचं ॥ ॥ ॥ चले बाछ मीचं ॥७३॥ ॥ इकै बार टूटे ॥ ॥ मनो बाज छूटे ॥ ॥ लयो घोरि रामं ॥ ॥ ॥ ससं जेम कामं ॥७४॥ ॥ घिरयो दैत सैणं ॥ ॥ जिमं रुद्र मैणं ॥ ॥ रुके राम जंगं ॥ ॥ ॥ मनो सिंध गंगं ॥७५॥ ॥ रणं राम बज्जे ॥ ॥ धुणं मेघ लज्जे ॥ ॥ रुले तच्छ मुच्छं ॥ ॥ ॥ गिरे सूर स्वच्छं ॥७६॥
॥ चलै ऐंठ मुच्छैं ॥ ॥ कहां राम पुच्छैं ॥ ॥ अबै हाथि लागे ॥ ॥ ॥ कहा जाहु भागै ॥७७॥ ॥ रिपं पेख रामं ॥ ॥ हठियो धरम धामं ॥ ॥ करै नैण रातं ॥ ॥ ॥ धनुर बेद गयातं ॥७८॥ ॥ धनं उग्र करखियो ॥ ॥ सरंधार बरखियो ॥ ॥ हणी सत्र सैणं ॥ ॥ ॥ हसे देव गैणं ॥७९॥ ॥ भजी सरब सैणं ॥ ॥ लखी म्रीच नैणं ॥ ॥ फिरियो रोस प्रेरियो ॥ ॥ ॥ मनो साप छेड़यो ॥८०॥ ॥ हणियो राम बाणं ॥ ॥ करियो सिंध पयाणं ॥ ॥ तजियो राज देसं ॥ ॥ ॥ लियो जोग भेसं ॥८१॥ ॥ सु बसत्रं उतारे ॥ ॥ भगवे बसत्र धारे ॥ ॥ बसयो लंक बागं ॥ ॥ ॥ पुनर द्रोह तिआगं ॥८२॥ ॥ सरोसं सुबाहं ॥ ॥ चड़यो लै सिपाहं ॥ ॥ ठटयो आण जुधं ॥ ॥ ॥ भयो नाद उधं ॥८३॥ ॥ सुभं सैण साजी ॥ ॥ तुरे तुंद ताजी ॥ ॥ गजा जूह गज्जे ॥ ॥ ॥ धुणं मेघ लज्जे ॥८४॥ ॥ ढका ढुक ढालं ॥ ॥ सुभी पीत लालं ॥ ॥ गहे ससत्र उठे ॥ ॥ ॥ सरंधार बुठे ॥८५॥ ॥ बहै अगन असत्रं ॥ ॥ छुटे सरब ससत्रं ॥ ॥ रंगे स्रोण ऐसे ॥ ॥ ॥ चड़े बयाह जैसे ॥८६॥ ॥ घणै घाइ घूमे ॥ ॥ मदी जैस झूमे ॥ ॥ गहे बीर ऐसे ॥ ॥ ॥ फुलै फूल जैसे ॥८७॥ ॥ हठियो दानवेसं ॥ ॥ भयो आप भेसं ॥ ॥ बजे घोर बाजे ॥ ॥ ॥ धुणं अभ्र लाजे ॥८८॥ ॥ रथी नाग कूटे ॥ ॥ फिरैं बाज छूटै ॥ ॥ भयो जुध भारी ॥ ॥ ॥ छुटी रुद्र तारी ॥८९॥ ॥ बजे घंट भेरी ॥ ॥ डहे डाम डेरी ॥ ॥ रणंके निसाणं ॥ ॥ ॥ कणंछे किकाणं ॥९०॥ ॥ धहा धूह धोपं ॥ ॥ टका टूक टोपं ॥ ॥ कटे चरम बरमं ॥ ॥ ॥ पलियो छत्र धरमं ॥९१॥ ॥ भयो दुंद जुधं ॥ ॥ भरयो राम क्रुधं ॥ ॥ कटी दुसट बाहं ॥ ॥ ॥ संघारयो सुबाहं ॥९२॥ ॥ त्रसै दैत भाजे ॥ ॥ रणं राम गाजे ॥ ॥ भुअं भार उतारियो ॥ ॥ ॥ रिखीसं उबारियो ॥९३॥ ॥ सभै साध हरखे ॥ ॥ भए जीत करखे ॥ ॥ करै देव अरचा ॥ ॥ ॥ ररै बेद चरचा ॥९४॥ ॥ भयो जग पूरं ॥ ॥ गए पाप दूरं ॥ ॥ सुरं सरब हरखे ॥ ॥ ॥ धनंधार बरखे ॥९५॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे रामावतारे कथा सुबाह मरीच बधह जगय स्मपूरन करनं समापतम ॥ ॥ अथ सीता सुय्मबर कथनं ॥ ॥ रसावल छंद ॥ ॥ रचयो सुय्मबर सीता ॥ ॥ महां सुध गीता ॥ ॥ बिधं चार बैणी ॥ ॥ ॥ म्रिगी राज नैणी ॥९६॥ ॥ सुणयो मोननेसं ॥ ॥ चतुर चार देसं ॥ ॥ लयो संग रामं ॥ ॥ ॥ चलयो धरम धामं ॥९७॥
॥ सुनो राम पिआरे ॥ ॥ चलो साथ हमारे ॥ ॥ सीआ सुय्मबर कीनो ॥ ॥ ॥ न्रिपं बोल लीनो ॥९८॥ ॥ तहा प्रात जईऐ ॥ ॥ सीआ जीत लईऐ ॥ ॥ कही मान मेरी ॥ ॥ ॥ बनी बात तेरी ॥९९॥ ॥ बली पान बाके ॥ ॥ निपातो पिनाके ॥ ॥ सीआ जीत आनो ॥ ॥ ॥ हनो सरब दानो ॥१००॥ ॥ चले राम संगं ॥ ॥ सुहाए निखंगं ॥ ॥ भए जाइ ठाढे ॥ ॥ ॥ महां मोद बाढे ॥१०१॥ ॥ पुरं नार देखै ॥ ॥ सही काम लेखै ॥ ॥ रिपं सत्रु जानै ॥ ॥ ॥ सिधं साध मानै ॥१०२॥ ॥ सिसं बाल रूपं ॥ ॥ लहयो भूप भूपं ॥ ॥ तपयो पउन हारी ॥ ॥ ॥ भरं ससत्र धारी ॥१०३॥ ॥ निसा चंद जानयो ॥ ॥ दिनं भान मानयो ॥ ॥ गणं रुद्र रेखयो ॥ ॥ ॥ सुरं इंद्र देखयो ॥१०४॥ ॥ स्रुतं ब्रहम जानयो ॥ ॥ दिजं बयास मानयो ॥ ॥ हरी बिसन लेखे ॥ ॥ ॥ सीआ राम देखे ॥१०५॥ ॥ सीआ पेख रामं ॥ ॥ बिधी बाण कामं ॥ ॥ गिरी झूमि भूमं ॥ ॥ ॥ मदी जाणु घूमं ॥१०६॥ ॥ उठी चेत ऐसे ॥ ॥ महांबीर जैसे ॥ ॥ रही नैन जोरी ॥ ॥ ॥ ससं जिउ चकोरी ॥१०७॥ ॥ रहे मोह दोनो ॥ ॥ टरे नाहि कोनो ॥ ॥ रहे ठांढ ऐसे ॥ ॥ ॥ रणं बीर जैसे ॥१०८॥ ॥ पठे कोट दूतं ॥ ॥ चले पउन पूतं ॥ ॥ कुवंडान डारे ॥ ॥ ॥ नरेसो दिखारे ॥१०९॥ ॥ लयो राम पानं ॥ ॥ भरयो बीर मानं ॥ ॥ हसयो ऐच लीनो ॥ ॥ ॥ उभै टूक कीनो ॥११०॥ ॥ सभै देव हरखे ॥ ॥ घनं पुहप बरखे ॥ ॥ लजाने नरेसं ॥ ॥ ॥ चले आप देसं ॥१११॥ ॥ तबै राज कंनिआ ॥ ॥ तिहूं लोक धंनिआ ॥ ॥ धरे फूल माला ॥ ॥ ॥ बरियो राम बाला ॥११२॥ ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ ॥ किधौ देव कंनिआ किधौ बासवी है ॥ ॥ किधौ जछनी किंन्रनी नागनी है ॥ ॥ किधौ गंध्रबी दैत जा देवता सी ॥ ॥ ॥ किधौ सूरजा सुध सोधी सुधा सी ॥११३॥ ॥ किधौ जच्छ बिदिआ धरी गंध्रबी है ॥ ॥ किधौ रागनी भाग पूरे रची है ॥ ॥ किधौ सुवरन की चित्र की पुत्रका है ॥ ॥ ॥ किधौ काम की कामनी की प्रभा है ॥११४॥ ॥ किधौ चित्र की पुत्रका सी बनी है ॥ ॥ किधौ संखनी चित्रनी पदमनी है ॥ ॥ किधौ राग पूरे भरी राग माला ॥ ॥ ॥ बरी राम तैसी सीआ आज बाला ॥११५॥ ॥ छके प्रेम दोनो लगे नैन ऐसे ॥ ॥ मनो फाध फांधै म्रिगीराज जैसे ॥ ॥ बिधुं बाक बैणी कटं देस छीणं ॥ ॥ ॥ रंगे रंग रामं सुनैणं प्रबीणं ॥११६॥ ॥ जिणी राम सीता सुणी स्रउण रामं ॥ ॥ गहे ससत्र असत्रं रिसयो तउन जामं ॥ ॥ कहा जात भाखियो रहो राम ठाढे ॥ ॥ ॥ लखो आज कैसे भए बीर गाढे ॥११७॥
॥ भाखा पिंगल दी ॥ ॥ सुंदरी छंद ॥ ॥ भट हुंके धुंके बंकारे ॥ ॥ रण बज्जे गज्जे नगारे ॥ ॥ रण हुल कलोलं हुलालं ॥ ॥ ॥ ढल हलं ढलं उछालं ॥११८॥ ॥ रण उठ्ठे कुठ्ठे मुछाले ॥ ॥ सर छुट्टे जुट्टे भीहाले ॥ ॥ रतु डिग्गे भिग्गे जोधाणं ॥ ॥ ॥ कणणंछे कच्छे किकाणं ॥११९॥ ॥ भीखणीयं भेरी भुंकारं ॥ ॥ झल लंके खंडे दुधारं ॥ ॥ जुधं जुझारं बुबाड़े ॥ ॥ ॥ रुलीए पखरीए आहाड़े ॥१२०॥ ॥ बक्के बब्बाड़े बंकारं ॥ ॥ नचे पखरीए जुझारं ॥ ॥ बज्जे संगलीए भीहाले ॥ ॥ ॥ रण रत्ते मत्ते मुच्छाले ॥१२१॥ ॥ उछलीए कच्छी कच्छाले ॥ ॥ उडे जणु पबं पच्छाले ॥ ॥ जुट्टे भट छुट्टे मुच्छाले ॥ ॥ ॥ रुलीए आहाड़ं पखराले ॥१२२॥ ॥ बज्जे संधूरं नगारे ॥ ॥ कच्छे कच्छीले लुझारे ॥ ॥ गण हूरं पूरं गैणायं ॥ ॥ ॥ अंजनयं अंजे नैणायं ॥१२३॥ ॥ रण णके नादं नाफीरं ॥ ॥ बब्बाड़े बीरं हाबीरं ॥ ॥ उघे जणु नेजे जट्टाले ॥ ॥ ॥ छुट्टे सिल सितियं मुच्छाले ॥१२४॥ ॥ भट डिगे घायं अघायं ॥ ॥ तन सुभे अधे अधायं ॥ ॥ दल गज्जे बज्जे नीसाणं ॥ ॥ ॥ चंचलीए ताजी चीहाणं ॥१२५॥ ॥ चव दिसयं चिंकी चावंडै ॥ ॥ खंडे खंडे कै आखंडै ॥ ॥ रण ड़ंके गिधं उधाणं ॥ ॥ ॥ जै ज्मपै सिंधं सुधाणं ॥१२६॥ ॥ फुल्ले जणु किंसक बासंतं ॥ ॥ रण रत्ते सूरा सामंतं ॥ ॥ डिगे रण सुंडी सुंडाणं ॥ ॥ ॥ धर भूरं पूरं मुंडाणं ॥१२७॥ ॥ मधुर धुनि छंद ॥ ॥ तर भर रामं ॥ ॥ परहर कामं ॥ ॥ धर बर धीरं ॥ ॥ ॥ परहरि तीरं ॥१२८॥ ॥ दर बर गयानं ॥ ॥ पर हरि धयानं ॥ ॥ थरहर क्मपै ॥ ॥ ॥ हरि हरि ज्मपै ॥१२९॥ ॥ क्रोधं गलितं ॥ ॥ बोधं दलितं ॥ ॥ कर सर सरता ॥ ॥ ॥ धरमर हरता ॥१३०॥ ॥ सरबर पाणं ॥ ॥ धर कर माणं ॥ ॥ अर उर साली ॥ ॥ ॥ धर उरि माली ॥१३१॥ ॥ कर बर कोपं ॥ ॥ थरहर धोपं ॥ ॥ गर बर करणं ॥ ॥ ॥ घर बर हरणं ॥१३२॥ ॥ छर हर अंगं ॥ ॥ चर खर संगं ॥ ॥ जर बर जामं ॥ ॥ ॥ झर हर रामं ॥१३३॥ ॥ टर धरि जायं ॥ ॥ ठर हरि पायं ॥ ॥ ढर हर ढालं ॥ ॥ ॥ थरहर कालं ॥१३४॥ ॥ अर बर दरणं ॥ ॥ नर बर हरणं ॥ ॥ धर बर धीरं ॥ ॥ ॥ फर हर तीरं ॥१३५॥ ॥ बर नर दरणं ॥ ॥ भर हर करणं ॥ ॥ हर हर रड़ता ॥ ॥ ॥ बर हर गड़ता ॥१३६॥ ॥ सरबर हरता ॥ ॥ चरमरि धरता ॥ ॥ बरमरि पाणं ॥ ॥ ॥ करबर जाणं ॥१३७॥ ॥ हरबरि हारं ॥ ॥ कर बर बारं ॥ ॥ गडबड रामं ॥ ॥ ॥ गड़बड़ धामं ॥१३८॥ ॥ चरपट छीगा के आदि क्रित छंद ॥ ॥ खग्ग खयाता ॥ ॥ गयान गयाता ॥ ॥ चित्र बरमा ॥ ॥ ॥ चार चरमा ॥१३९॥
॥ सासत्रं गयाता ॥ ॥ ससत्रं खयाता ॥ ॥ चित्रं जोधी ॥ ॥ ॥ जुधं क्रोधी ॥१४०॥ ॥ बीरं बरणं ॥ ॥ भीरं भरणं ॥ ॥ सत्रं हरता ॥ ॥ ॥ अत्रं धरता ॥१४१॥ ॥ बरमं बेधी ॥ ॥ चरमं छेदी ॥ ॥ छत्रं हंता ॥ ॥ ॥ अत्रं गंता ॥१४२॥ ॥ जुधं धामी ॥ ॥ बुधं गामी ॥ ॥ ससत्रं खयाता ॥ ॥ ॥ असत्रं गयाता ॥१४३॥ ॥ जुधा माली ॥ ॥ कीरत साली ॥ ॥ धरमं धामं ॥ ॥ ॥ रूपं रामं ॥१४४॥ ॥ धीरं धरता ॥ ॥ बीरं हरता ॥ ॥ जुधं जेता ॥ ॥ ॥ ससत्रं नेता ॥१४५॥ ॥ दुरदं गामी ॥ ॥ धरमं धामी ॥ ॥ जोगं ज्वाली ॥ ॥ ॥ जोतं माली ॥१४६॥ ॥ परसुराम बाच ॥ ॥ स्वैया ॥ ॥ तूणि कसे कट चांप धरे कर कोप कही दिज राम अहो ॥ ॥ ग्रह तोरि सरासन संकर को सीअ जात हरे तुम कउन कहो ॥ ॥ बिन साच कहे नेही प्रान बचे जिनि कंठ कुठार की धार सहो ॥ ॥ ॥ घर जाहु चले तज राम रणं जिनि जूझि मरो पल ठांढ रहो ॥१४७॥ ॥ स्वैया ॥ ॥ जानत हो अविलोक मुझै हठि एक बली नही ठांढ रहैंगे ॥ ॥ ताति गहयो जिन को त्रिण दांतन तेन कहा रण आज गहैंगे ॥ ॥ ब्मब बजे रण खंड गडे गहि हाथ हथिआर कहूं उमहैंगे ॥ ॥ ॥ भूम अकास पताल दुरैबे कउ राम कहो कहां ठाम लहैंगे ॥१४८॥ ॥ कबि बाच ॥ ॥ यौ जब बैन सुने अरि के तब स्री रघुबीर बली बलकाने ॥ ॥ सात समुंद्रन लौ गरवे गिर भूमि अकास दोऊ थहराने ॥ ॥ जच्छ भुजंग दिसा बिदिसान के दानव देव दुहूं डर माने ॥ ॥ ॥ स्री रघुनाथ कमान ले हाथ कहो रिस कै किह पै सर ताने ॥१४९॥ ॥ परसु राम बाच राम सो ॥ ॥ जेतक बैन कहे सु कहे जु पै फेरि कहे तु पै जीत न जैहो ॥ ॥ हाथि हथिआर गहे सु गहे जु पै फेरि गहे तु पै फेरि न लैहो ॥ ॥ राम रिसै रण मै रघुबीर कहो भजि कै कत प्रान बचैहो ॥ ॥ ॥ तोर सरासन संकर को हरि सीअ चले घरि जान न पैहो ॥१५०॥ ॥ राम बाच परसुराम सो ॥ ॥ स्वैया ॥ ॥ बोल कहे सु सहे दिस जू जु पै फेरि कहे ते पै प्रान ख्वैहो ॥ ॥ बोलत ऐंठ कहा सठ जिउ सभ दांत तुराइ अबै घरि जैहो ॥ ॥ धीर तबै लहिहै तुम कउ जद भीर परी इक तीर चलैहो ॥ ॥ ॥ बात स्मभार कहो मुखि ते इन बातन को अब ही फलि पैहो ॥१५१॥ ॥ परसु राम बाच ॥ ॥ स्वैया ॥ ॥ तउ तुम साच लखो मन मै प्रभ जउ तुम राम वतार कहाओ ॥ ॥ रुद्र कुवंड बिहंडीय जिउ करि तिउ अपनो बल मोहि दिखाओ ॥
॥ तउ ही गदा कर सारंग चक्र लता भ्रिगा की उर मध सुहाओ ॥ ॥ ॥ मेरो उतार कुवंड महांबल मोहू कउ आज चड़ाइ दिखाओ ॥१५२॥ ॥ कबि बाच ॥ ॥ स्वैया ॥ ॥ स्री रघुबीर सिरोमन सूर कुवंड लयो कर मै हसि कै ॥ ॥ लीअ चांप चटाक चड़ाइ बली खट टूक करयो छिन मै कसि कै ॥ ॥ नभ की गति ताहि हती सर सो अध बीच ही बात रही बसि कै ॥ ॥ ॥ न बसात कछू नट के बट जयों भव पास निसंगि रहै फसि कै ॥१५३॥ ॥ ॥ इति स्री राम जुध जयत ॥२॥ ॥ अथ अउध प्रवेस कथनं ॥ ॥ स्वैया ॥ ॥ भेट भुजा भरि अंकि भले भरि नैन दोऊ निरखे रघुराई ॥ ॥ गुंजत भ्रिंग कपोलन ऊपर नाग लवंग रहे लिव लाई ॥ ॥ कंज कुरंग कला निध केहरि कोकिल हेर हीए हहराई ॥ ॥ ॥ बाल लखैं छबि खाट परैं नहि बाट चलै निरखे अधिकाई ॥१५४॥ ॥ सीअ रही मुरछाइ मनै रनि राम कहा मन बात धरैंगे ॥ ॥ तोरि सरासनि संकर को जिम मोहि बरिओ तिम अउर बरैंगे ॥ ॥ दूसर बयाह बधू अब ही मन ते मुहि नाथ बिसार डरैंगे ॥ ॥ ॥ देखत हौ निज भाग भले बिध आज कहा इह ठौर करैंगे ॥१५५॥ ॥ तउ ही लउ राम जिते दिज कउ अपने दल आइ बजाइ बधाई ॥ ॥ भगुल लोक फिरै सभ ही रण मो लखि राघव की अधकाई ॥ ॥ सीअ रही रन राम जिते अवधेसर बात जबै सुनि पाई ॥ ॥ ॥ फूलि ग्यो अति ही मन मै धन के घन की बरखा बरखाई ॥१५६॥ ॥ बंदनवार बधी सभ ही दर चंदन सौ छिरके ग्रह सारे ॥ ॥ केसर डारि बरातन पै सभ ही जन हुइ पुरहूत पधारे ॥ ॥ बाजत ताल मुचंग पखावज नाचत कोटनि कोटि अखारे ॥ ॥ ॥ आनि मिले सभ ही अगूआ सुत कउ पितु लै पुर अउध सिधारे ॥१५७॥ ॥ चौपई ॥ ॥ सभहू मिलि गिल कीयो उछाहा ॥ ॥ पूत तिहूं कउ रचयो बियाहा ॥ ॥ राम सीआ बर कै घरि आए ॥ ॥ ॥ देस बिदेसन होत बधाए ॥१५८॥ ॥ जह तह होत उछाह अपारू ॥ ॥ तिहूं सुतन को बयाह बिचारू ॥ ॥ बाजत ताल म्रिदंग अपारं ॥ ॥ ॥ नाचत कोटन कोट अखारं ॥१५९॥ ॥ बनि बनि बीर पखरीआ चले ॥ ॥ जोबनवंत सिपाही भले ॥ ॥ भए जाइ इसथत न्रिप दर पर ॥ ॥ ॥ महारथी अरु महा धनुरधर ॥१६०॥
॥ बाजत जंग मुचंग अपारं ॥ ॥ ढोल म्रिदंग सुरंग सुधारं ॥ ॥ गावत गीत चंचला नारी ॥ ॥ ॥ नैन नचाइ बजावत तारी ॥१६१॥ ॥ भिच्छकन हवस न धन की रही ॥ ॥ दान स्वरन सरता हुइ बही ॥ ॥ एक बात मागन कउ आवै ॥ ॥ ॥ बीसक बात घरै लै जावै ॥१६२॥ ॥ बनि बनि चलत भए रघुनंदन ॥ ॥ फूले पुहप बसंत जानु बन ॥ ॥ सोभत केसर अंगि डरायो ॥ ॥ ॥ आनंद हीए उछर जन आयो ॥१६३॥ ॥ साजत भए अमित चतुरंगा ॥ ॥ उमड चलत जिह बिधि करि गंगा ॥ ॥ भल भल कुअर चड़े सज सैना ॥ ॥ ॥ कोटक चड़े सूर जनु गैना ॥१६४॥ ॥ भरथ सहित सोभत सभ भ्राता ॥ ॥ कहि न परत मुख ते कछु बाता ॥ ॥ मातन मन सुंदर सुत मोहैं ॥ ॥ ॥ जनु दित ग्रह रवि सस दोऊ सोहैं ॥१६५॥ ॥ इह बिध कै सज सुध बराता ॥ ॥ कछु न परत कहि तिन की बाता ॥ ॥ बाढत कहत ग्रंथ बातन कर ॥ ॥ ॥ बिदा होन सिस चले तात घर ॥१६६॥ ॥ आइ पिता कहु कीन प्रनामा ॥ ॥ जोरि पान ठाढे बनि धामा ॥ ॥ निरखि पुत्र आनंद मन भरे ॥ ॥ ॥ दान बहुत बिप्पन कह करे ॥१६७॥ ॥ तात मात लै कंठि लगाए ॥ ॥ जन दुइ रतन निरधनी पाए ॥ ॥ बिदा मांग जब गए राम घर ॥ ॥ ॥ सीस रहे धरि चरन कमल पर ॥१६८॥ ॥ कबित्त ॥ ॥ राम बिदा करे सिर चूमयो पान पीठ धरे आनंद सो भरे लै त्मबोर आगे धरे हैं ॥ ॥ दुंदभी बजाइ तीनो भाई यौ चलत भए मानो सूर चंद कोटि आन अवतरे हैं ॥ ॥ केसर सो भीजे पट सोभा देत ऐसी भांत मानो रूप राग के सुहाग भाग भरे हैं ॥ ॥ ॥ राजा अवधेस के कुमार ऐसे सोभा देत कामजू ने कोटिक कलियोरा कैधौ करे हैं ॥१६९॥ ॥ कबित ॥ ॥ अउध ते निसर चले लीने संगि सूर भले रन ते न टले पले सोभा हूं के धाम के ॥ ॥ सुंदर कुमार उर हार सोभत अपार तीनो लोग मध की मुहया सभ बाम के ॥ ॥ दुरजन दलया तीनो लोक के जित्या तीनो राम जू के भया हैं चह्या हर नाम के ॥ ॥ ॥ बुध के उदार हैं सिंगार अवतार दान सील के पहार कै कुमार बने काम के ॥१७०॥ ॥ अस्व बरननं ॥ ॥ कबितु ॥ ॥ नागरा के नैन हैं कि चातरा के बैन हैं बघूला मानो गैन कैसे तैसे थहरत हैं ॥ ॥ न्रितका के पाउ हैं कि जूप कैसे दाउ हैं कि छल को दिखाउ कोऊ तैसे बिहरत हैं ॥
॥ हाके बाज बीर हैं तुफंग कैसे तीर हैं कि अंजनी के धीर हैं कि धुजा से फहरत हैं ॥ ॥ ॥ लहरैं अनंग की तरंग जैसे गंग की अनंग कैसे अंग जयों न कहूं ठहरत हैं ॥१७१॥ ॥ निसा निसनाथि जानै दिन दिनपति मानै भिच्छकन दाता कै प्रमाने महां दान हैं ॥ ॥ अउखधी के रोगन अनंत रूप जोगन समीप कै बियोगन महेस महा मान हैं ॥ ॥ सत्रै खग खयाता सिस रूपन के माता महां गयानी गयान गयाता कै बिधाता कै समान हैं ॥ ॥ ॥ गनन गनेस मानै सुरन सुरेस जानै जैसे पेखै तैसे ई लखे बिराजमान हैं ॥१७२॥ ॥ सुधा सौ सुधारे रूप सोभत उजियारे किधौ साचे बीच ढारे महा सोभा कै सुधार कै ॥ ॥ किधौ महा मोहनी के मोहबे नमित्त बीर बिधना बनाए महां बिध सो बिचार कै ॥ ॥ किधौ देव दैतन बिबाद छाड बडे चिर मथ कै समुंद्र छीर लीने है निकार कै ॥ ॥ ॥ किधौ बिस्वनाथ जू बनाए निज पेखबे कउ अउर न सकत ऐसी सूरतै सुधार कै ॥१७३॥ ॥ सीम तजि आपनी बिराने देस लांघ लांघ राजा मिथलेस के पहूचे देस आन कै ॥ ॥ तुरही अनंत बाजै दुंदभी अपार गाजै भांति भांति बाजन बजाए जोर जान कै ॥ ॥ आगै आनि तीनै न्रिप कंठ लाइ लीने रीत रूड़ सभै कीने बैठे बेद कै बिधान कै ॥ ॥ ॥ बरिखयो धन की धार पाइयत न पारावार भिच्छक भए न्रिपार ऐसे पाइ दान कै ॥१७४॥ ॥ बाने फहराने घहराने दुंदभ अरराने जनक पुरी कौ नीअराने बीर जाइ कै ॥ ॥ कहूं चउर ढारै कहूं चारण उचारै कहूं भाट जु पुकारै छंद सुंदर बनाइ कै ॥ ॥ कहूं बीन बाजै कोऊ बासुरी म्रिदंग साजै देखे काम लाजै रहे भिच्छक अघाइ कै ॥ ॥ ॥ रंक ते सु राजा भए आसिख असेख दए मांगत न भए फेर ऐसो दान पाइ कै ॥१७५॥ ॥ आन कै जनक लीनो कंठ सो लगाइ तिहूं आदर दुरंत कै अनंत भांति लए हैं ॥ ॥ बेद के बिधान कै कै बयास ते बधाई बेद एक एक बिप्र कउ बिसेख स्वरन दए हैं ॥ ॥ राजकुआर सभै पहिराइ सिरपाइन ते मोतीमान करके बरख मेघ गए हैं ॥ ॥ ॥ दंती स्वेत दीने केते सिंधली तुरे नवीने राजा के कुमार तीनो बयाह कै पठए हैं ॥१७६॥ ॥ दोधक छंद ॥ ॥ बियाह सुता न्रिप की न्रिपबालं ॥ ॥ मांग बिदा मुखि लीन उतालं ॥ ॥ साजन बाज चले गज संजुत ॥ ॥ ॥ एसनएस नरेसन के जुत ॥१७७॥
॥ दाज सुमार सकै कर कउनै ॥ ॥ बीन सकै बिधना नही तउनै ॥ ॥ बेसन बेसन बाज महा मत ॥ ॥ ॥ भेसन भेस चले गज गज्जत ॥१७८॥ ॥ बाजत नाद नफीरन के गन ॥ ॥ गाजत सूर प्रमाथ महा मन ॥ ॥ अउध पुरी नीअरान रही जब ॥ ॥ ॥ प्रापत भए रघुनंद तही तब ॥१७९॥ ॥ मातन वारि पीयो जल पानं ॥ ॥ देख नरेस रहे छबि मानं ॥ ॥ भूप बिलोकत लाइ लए उर ॥ ॥ ॥ नाचत गावत गीत भए पुरि ॥१८०॥ ॥ भूपज बयाह जबै ग्रह आए ॥ ॥ बाजत भांति अनेक बधाए ॥ ॥ तात बसिसट सुमित्र बुलाए ॥ ॥ ॥ अउर अनेक तहां रिखि आए ॥१८१॥ ॥ घोर उठी घहराइ घटा तब ॥ ॥ चारो दिस दिग दाह लखियो सभ ॥ ॥ मंत्री मित्र सभै अकुलाने ॥ ॥ ॥ भूपति सो इह भांत बखाने ॥१८२॥ ॥ होत उतपात बडे सुण राजन ॥ ॥ मंत्र करो रिख जोर समाजन ॥ ॥ बोलहु बिप्प बिल्मब न कीजै ॥ ॥ ॥ है क्रित जग अर्मभन कीजै ॥१८३॥ ॥ आइस राज दयो ततकालह ॥ ॥ मंत्र सु मित्रह बुध बिसालह ॥ ॥ है क्रित जग अर्मभन कीजै ॥ ॥ ॥ आइस बेग नरेस करीजै ॥१८४॥ ॥ बोलि बडे रिख लीन महां दिज ॥ ॥ है तिन बोल लयो जुत रितज ॥ ॥ पावक कुंड खुदियो तिह अउसर ॥ ॥ ॥ गाडिय ख्मभ तहां धरमं धर ॥१८५॥ ॥ छोरि लयो हयसारह ते हय ॥ ॥ असित करन प्रभासत केकय ॥ ॥ देसन देस नरेस दए संगि ॥ ॥ ॥ सुंदर सूर सुरंग सुभै अंग ॥१८६॥ ॥ समानका छंद ॥ ॥ नरेस संगि कै दए ॥ ॥ प्रबीन बीन कै लए ॥ ॥ सनधबध हुइ चले ॥ ॥ ॥ सु बीर बीर हा भले ॥१८७॥ ॥ बिदेस देस गाह कै ॥ ॥ अदाह ठउर दाह कै ॥ ॥ फिराइ बाज राज कउ ॥ ॥ ॥ सुधार राज काज कउ ॥१८८॥ ॥ नरेस पाइ लागीयं ॥ ॥ दुरंत दोख भागीयं ॥ ॥ सु पूर जग को करयो ॥ ॥ ॥ नरेस त्रास कउ हरियो ॥१८९॥ ॥ अनंत दान पाइ कै ॥ ॥ चले दिजं अघाइ कै ॥ ॥ दुरंत आसिखैं रड़ैं ॥ ॥ ॥ रिचा सु बेद की पड़ैं ॥१९०॥ ॥ नरेस देस देस के ॥ ॥ सुभंत बेस बेस के ॥ ॥ बिसेख सूर सोभहीं ॥ ॥ ॥ सुसील नारि लोभहीं ॥१९१॥ ॥ बजंत्र कोट बाजहीं ॥ ॥ सनाइ भेर साजहीं ॥ ॥ बनाइ देवता धरैं ॥ ॥ ॥ समान जाइ पा परैं ॥१९२॥ ॥ करै डंडउत पा परैं ॥ ॥ बिसेख भावना धरैं ॥ ॥ सु मंत्र जंत्र जापीऐ ॥ ॥ ॥ दुरंत थाप थापीऐ ॥१९३॥ ॥ नचात चारु मंगना ॥ ॥ सु जान देव अंगना ॥ ॥ कमी न कउन काज की ॥ ॥ ॥ प्रभाव रामराज की ॥१९४॥
॥ सारसुती छंद ॥ ॥ देस देसन की क्रिआ सिखवंत हैं दिज एक ॥ ॥ बान अउर कमान की बिध देत आनि अनेक ॥ ॥ भांत भांतन सों पड़ावत बार नारि सिंगार ॥ ॥ ॥ कोक काबय पड़ै कहूं बयाकरन बेद बिचार ॥१९५॥ ॥ राम परम पवित्र है रघुबंस के अवतार ॥ ॥ दुसट दैतन के संघारक संत प्रान अधार ॥ ॥ देसि देसि नरेस जीत असेस कीन गुलाम ॥ ॥ ॥ जत्र तत्र धुजा बधी जै पत्र की सभ धाम ॥१९६॥ ॥ बाटि तीन दिसा तिहूं सुत राजधानी राम ॥ ॥ बोल राज बिसिसट कीन बिचार केतक जाम ॥ ॥ साज राघव राज के घट पूरि राखसि एक ॥ ॥ ॥ आंब्र मउलन दीसु उदकं अउर पुहप अनेक ॥१९७॥ ॥ थार चार अपार कुंकम चंदनादि अनंत ॥ ॥ राज साज धरे सभै तह आन आन दुरंत ॥ ॥ मंथरा इक गांध्रबी ब्रहमा पठी तिह काल ॥ ॥ ॥ बाज साज सणै चड़ी सभ सुभ्र धउल उताल ॥१९८॥ ॥ बेण बीण म्रदंग बाद सुणे रही चक बाल ॥ ॥ रामराज उठी जयत धुनि भूमि भूर बिसाल ॥ ॥ जात ही संगि केकई इह भांति बोली बाति ॥ ॥ ॥ हाथ बात छुटी चली बर मांग हैं किह राति ॥१९९॥ ॥ केकई इम जउ सुनी भई दुखता सरबंग ॥ ॥ झूम भूम गिरी म्रिगी जिम लाग बण सुरंग ॥ ॥ जात ही अवधेस कउ इह भांति बोली बैन ॥ ॥ ॥ दीजीए बर भूप मो कउ जो कहे दुइ दैन ॥२००॥ ॥ राम को बन दीजीऐ मम पूत कउ निज राज ॥ ॥ राज साज सु स्मपदा दोऊ चउर छत्र समाज ॥ ॥ देस अउरि बिदेस की ठकुराइ दै सभ मोहि ॥ ॥ ॥ सत सील सती जत ब्रत तउ पछानो तोहि ॥२०१॥ ॥ पापनी बन राम को पै हैं कहा जस काढ ॥ ॥ भसम आनन ते गई कहि कै सके असि बाढ ॥ ॥ कोप भूप कुअंड लै तुहि काटीऐ इह काल ॥ ॥ ॥ नास तोरन कीजीऐ तक छाडीऐ तुहि बाल ॥२०२॥ ॥ नग सरूपी छंद ॥ ॥ नर देव देव राम है ॥ ॥ अभेव धरम धाम है ॥ ॥ अबुध नारि तै मनै ॥ ॥ ॥ बिसुध बात को भनै ॥२०३॥ ॥ अगाधि देव अनंत है ॥ ॥ अभूत सोभवंत है ॥ ॥ क्रिपाल करम कारणं ॥ ॥ ॥ बिहाल दिआल तारणं ॥२०४॥ ॥ अनेक संत तारणं ॥ ॥ अदेव देव कारणं ॥ ॥ सुरेस भाइ रूपणं ॥ ॥ ॥ समिध्र सिध कूपणं ॥२०५॥ ॥ बरं नरेस दीजीऐ ॥ ॥ कहे सु पूर कीजीऐ ॥ ॥ न संक राज धारीऐ ॥ ॥ ॥ न बोल बोल हारीऐ ॥२०६॥
॥ नग सरूपी अधा छंद ॥ ॥ न लाजीऐ ॥ ॥ न भाजीऐ ॥ ॥ रघुएस को ॥ ॥ ॥ बनेस को ॥२०७॥ ॥ बिदा करो ॥ ॥ धरा हरो ॥ ॥ न भाजीऐ ॥ ॥ ॥ बिराजीऐ ॥२०८॥ ॥ बसिसट को ॥ ॥ दिजिसट को ॥ ॥ बुलाईऐ ॥ ॥ ॥ पठाईऐ ॥२०९॥ ॥ नरेस जी ॥ ॥ उसेस ली ॥ ॥ घुमे घिरे ॥ ॥ ॥ धरा गिरे ॥२१०॥ ॥ सुचेत भे ॥ ॥ अचेत ते ॥ ॥ उसास लै ॥ ॥ ॥ उदास ह्वै ॥२११॥ ॥ उगाध छंद ॥ ॥ सबार नैणं ॥ ॥ उदास बैणं ॥ ॥ कहियो कुनारी ॥ ॥ ॥ कुब्रित्त कारी ॥२१२॥ ॥ कलंक रूपा ॥ ॥ कुविरत कूपा ॥ ॥ निलज्ज नैणी ॥ ॥ ॥ कुबाक बैणी ॥२१३॥ ॥ कलंक करणी ॥ ॥ सम्रिध हरणी ॥ ॥ अक्रित्त करमा ॥ ॥ ॥ निलज्ज धरमा ॥२१४॥ ॥ अलज्ज धामं ॥ ॥ निलज्ज बामं ॥ ॥ असोभ करणी ॥ ॥ ॥ ससोभ हरणी ॥२१५॥ ॥ निलज्ज नारी ॥ ॥ कुकरम कारी ॥ ॥ अधरम रूपा ॥ ॥ ॥ अकज्ज कूपा ॥२१६॥ ॥ पहपिटआरी ॥ ॥ कुकरम कारी ॥ ॥ मरै न मरणी ॥ ॥ ॥ अकाज करणी ॥२१७॥ ॥ केकई बाच ॥ ॥ नरेस मानो ॥ ॥ कहयो पछानो ॥ ॥ बदयो सु देहू ॥ ॥ ॥ बरं दु मोहू ॥२१८॥ ॥ चितार लीजै ॥ ॥ कहयो सु दीजै ॥ ॥ न धरम हारो ॥ ॥ ॥ न भरम टारो ॥२१९॥ ॥ बुलै बसिसटै ॥ ॥ अपूरब इसटै ॥ ॥ कही सीएसै ॥ ॥ ॥ निकार देसै ॥२२०॥ ॥ बिलम न कीजै ॥ ॥ सु मान लीजै ॥ ॥ रिखेस रामं ॥ ॥ ॥ निकार धामं ॥२२१॥ ॥ रहे न इआनी ॥ ॥ भई दिवानी ॥ ॥ चुपै न बउरी ॥ ॥ ॥ बकैत डउरी ॥२२२॥ ॥ ध्रिगंस रूपा ॥ ॥ निखेध कूपा ॥ ॥ द्रुबाक बैणी ॥ ॥ ॥ नरेस छैणी ॥२२३॥ ॥ निकार रामं ॥ ॥ अधार धामं ॥ ॥ हतयो निजेसं ॥ ॥ ॥ कुकरम भेसं ॥२२४॥ ॥ उगाथा छंद ॥ ॥ अजित जित्ते अबाह बाहे ॥ ॥ अखंड खंडे अदाह दाहे ॥ ॥ अभंड भंडे अडंग डंगे ॥ ॥ ॥ अमुंन मुंने अभंग भंगे ॥२२५॥ ॥ अकरम करमं अलक्ख लक्खे ॥ ॥ अडंड डंडे अभक्ख भक्खे ॥ ॥ अथाह थाहे अदाह दाहे ॥ ॥ ॥ अभंग भंगे अबाह बाहे ॥२२६॥ ॥ अभिज भिजे अजाल जाले ॥ ॥ अखाप खापे अचाल चाले ॥ ॥ अभिंन भिंने अडंड डांडे ॥ ॥ ॥ अकित्त कित्ते अमुंड मांडे ॥२२७॥ ॥ अछिद छिद्दे अदग्ग दागे ॥ ॥ अचोर चोरे अठग्ग ठागे ॥ ॥ अभिद भिद्दे अफोड़ फोड़े ॥ ॥ ॥ अकज्ज कज्जे अजोड़ जोड़े ॥२२८॥ ॥ अदग्ग दग्गे अमोड़ मोड़े ॥ ॥ अखिच्च खिच्चे अजोड़ जोड़े ॥ ॥ अकढ कढे असाध साधे ॥ ॥ ॥ अफट्ट फट्टे अफाध फाधे ॥२२९॥
॥ अधंध धंधे अकज्ज कज्जे ॥ ॥ अभिंन भिंने अभज्ज भज्जे ॥ ॥ अछेड़ छेड़े अलध लधे ॥ ॥ ॥ अजित्त जिते अबध बधे ॥२३०॥ ॥ अचीर चीर अतोड़ ताड़े ॥ ॥ अठट्ट ठट्टे अपाड़ पाड़े ॥ ॥ अधक धके अपंग पंगे ॥ ॥ ॥ अजुध जुधे अजंग जंगे ॥२३१॥ ॥ अकुट्ट कुट्टे अघुट्ट घाए ॥ ॥ अचूर चूरे अदाव दाए ॥ ॥ अभीर भीरे अभंग भंगे ॥ ॥ ॥ अटुक टुके अकंग कंगे ॥२३२॥ ॥ अखिद्द खेदे अढाह ढाहे ॥ ॥ अगंज गंजे अबाह बाहे ॥ ॥ अमुंन मुंने अहेह हेहे ॥ ॥ ॥ विरचंन नारी त सुख केहे ॥२३३॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ इह बिधि केकई हठ गहयो बर मांगन न्रिप तीर ॥ ॥ ॥ अति आतर किआ कहि सकै बिधयो काम के तीर ॥२३४॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ बहु बिधि पर पाइन रहे मोरे बचन अनेक ॥ ॥ ॥ गहिअउ हठि अबला रही मानयो बचन न एक ॥२३५॥ ॥ बर दयो मै छोरे नही तैं करि कोटि उपाइ ॥ ॥ ॥ घर मो सुत कउ दीजीऐ बनबासै रघुराइ ॥२३६॥ ॥ भूप धरनि बिन बुधि गिरयो सुनत बचन त्रिय कान ॥ ॥ ॥ जिम म्रिगेस बन के बिखै बधयो बध करि बान ॥२३७॥ ॥ तरफरात प्रिथवी परयो सुनि बन राम उचार ॥ ॥ ॥ पलक प्रान तयागे तजत मधि सफरि सर बार ॥२३८॥ ॥ राम नाम स्रवनन सुणयो उठि थिर भयो सुचेत ॥ ॥ ॥ जनु रण सुभट गिरयो उठयो गहि अस निडर सुचेत ॥२३९॥ ॥ प्रान पतन न्रिप बर सहो धरम न छोरा जाइ ॥ ॥ ॥ दैन कहे जो बर हुते तन जुत दए उठाइ ॥२४०॥ ॥ केकई बाच न्रिपो बाच ॥ ॥ बसिसट सों ॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ राम पयानो बन करै भरथ करै ठकुराइ ॥ ॥ ॥ बरख चतर दस के बिते फिरि राजा रघुराइ ॥२४१॥ ॥ कही बसिसट सुधार करि स्री रघुबर सो जाइ ॥ ॥ ॥ बरख चतुरदस भरथ न्रिप पुनि न्रिप स्री रघुराइ ॥२४२॥ ॥ सुनि बसिसट को बच स्रवण रघुपति फिरे ससोग ॥ ॥ ॥ उत दसरथ तन को तजयो स्री रघुबीर बियोग ॥२४३॥ ॥ सोरठा ॥ ॥ ग्रहि आवत रघुराइ सभु धन दीयो लुटाइ कै ॥ ॥ ॥ कटि तरकसी सुहाइ बोलत भे सीअ सो बचन ॥२४४॥ ॥ सुनि सीअ सुजस सुजान रहौ कौसलिआ तीर तुम ॥ ॥ ॥ राज करउ फिरि आन तोहि सहित बनबास बसि ॥२४५॥ ॥ सीता बाच राम सों ॥ ॥ सोरठा ॥ ॥ मै न तजो पीअ संगि कैसोई दुख जीअ पै परो ॥ ॥ ॥ तनक न मोरउ अंगि अंगि ते होइ अनंग किन ॥२४६॥
॥ राम बाच सीता प्रति ॥ ॥ मनोहर छंद ॥ ॥ जउ न रहउ ससुरार क्रिसोदर जाहि पिता ग्रिह तोहि पठै दिउ ॥ ॥ नैक से भानन ते हम कउ जोई ठाट कहो सोई गाठ गिठै दिउ ॥ ॥ जे किछु चाह करो धन की टुक मोह कहो सभ तोहि उठै दिउ ॥ ॥ ॥ केतक अउध को राज सलोचन रंक को लंक निसंक लुटै दिउ ॥२४७॥ ॥ घोर सीआ बन तूं सु कुमार कहो हम सों कस तै निबहै है ॥ ॥ गुंजत सिंघ डकारत कोल भयानक भील लखै भ्रम ऐहै ॥ ॥ सुंकत साप बकारत बाघ भकारत भूत महा दुख पैहै ॥ ॥ ॥ तूं सु कुमार रची करतार बिचार चले तुहि किउं बनि ऐहै ॥२४८॥ ॥ सीता वाच राम सों ॥ ॥ मनोहर छंद ॥ ॥ सूल सहों तन सूक रहों पर सी न कहों सिर सूल सहोंगी ॥ ॥ बाघ बुकार फनीन फुकार सु सीस गिरो पर सी न कहोंगी ॥ ॥ बास कहा बनबास भलो नही पास तजो पीय पाइ गहोंगी ॥ ॥ ॥ हास कहा इह उदास समै ग्रिह आस रहो पर मै न रहोंगी ॥२४९॥ ॥ राम बाच सीता प्रति ॥ ॥ रास कहो तुहि बास करो ग्रिह सासु की सेव भली बिधि कीजै ॥ ॥ काल ही बास बनै म्रिग लोचनि राज करों तुम सो सुन लीजै ॥ ॥ जौ न लगै जीय अउध सुभाननि जाहि पिता ग्रिह साच भनीजै ॥ ॥ ॥ तात की बात गडी जीय जात सिधात बनै मुहि आइस दीजै ॥२५०॥ ॥ लछमण बाच ॥ ॥ बात इतै इहु भांत भई सुनि आइगे भ्रात सरासन लीने ॥ ॥ कउन कुपूत भयो कुल मै जिन रामहि बास बनै कहु दीने ॥ ॥ काम के बान बधियो बस कामनि कूर कुचाल महा मति हीने ॥ ॥ ॥ रांड कुभांड के हाथ बिकियो कपि नाचत नाच छरी जिम चीने ॥२५१॥ ॥ काम को डंड लीए कर केकई बानर जिउ न्रिप नाच नचावै ॥ ॥ ऐठन ऐठ अमैठ लीए ढिग बैठ सूआ जिम पाठ पड़ावै ॥ ॥ सउतन सीस ह्वै ईसक ईस प्रिथीस जिउ चाम के दाम चलावै ॥ ॥ ॥ कूर कुजात कुपंथ दुरानन लोग गए परलोक गवावै ॥२५२॥ ॥ लोग कुटेव लगे उन की प्रभ पाव तजे मुहि कयो बन ऐहै ॥ ॥ जउ हट बैठ रहो घरि मो जस कयो चलिहै रघुबंस लजैहै ॥ ॥ काल ही काल उचारत काल गयो इह काल सभो छल जैहै ॥ ॥ ॥ धाम रहो नही साच कहों इह घात गई फिर हाथि न ऐहै ॥२५३॥
॥ चांप धरै कर चार कु तीर तुनीर कसे दोऊ बीर सुहाए ॥ ॥ आवध राज त्रीया जिह सोभत होन बिदा तिह तीर सिधाए ॥ ॥ पाइ परे भर नैन रहे भर मात भली बिध कंठ लगाए ॥ ॥ ॥ बोले ते पूत न आवत धामि बुलाइ लिउ आपन ते किमु आए ॥२५४॥ ॥ राम बाच माता प्रति ॥ ॥ तात दयो बनबास हमै तुम देह रजाइ अबै तह जाऊ ॥ ॥ कंटक कान बेहड़ गाहि त्रियोदस बरख बिते फिर आऊ ॥ ॥ जीत रहे तु मिलो फिरि मात मरे गए भूलि परी बखसाऊ ॥ ॥ ॥ भूपह कै अरिणी बर ते बस के बल मो फिरि राज कमाऊ ॥२५५॥ ॥ माता बाच राम सों ॥ ॥ मनोहर छंद ॥ ॥ मात सुनी इह बात जबै तब रोवत ही सुत के उर लागी ॥ ॥ हा रघुबीर सिरोमण राम चले बन कउ मुहि कउ कत तिआगी ॥ ॥ नीर बिना जिम मीन दसा तिम भूख पिआस गई सभ भागी ॥ ॥ ॥ झूम झराक झरी झट बाल बिसाल दवा उन की उर लागी ॥२५६॥ ॥ जीवत पूत तवानन पेख सीआ तुमरी दुत देख अघाती ॥ ॥ चीन सुमित्रज की छब को सभ सोक बिसार हीए हरखाती ॥ ॥ केकई आदिक सउतन कउ लखि भउह चड़ाइ सदा गरबाती ॥ ॥ ॥ ताकहु तात अनाथ जिउ आज चले बन को तजि कै बिललाती ॥२५७॥ ॥ होर रहे जन कोर कई मिलि जोर रहे कर एक न मानी ॥ ॥ लच्छन मात के धाम बिदा कहु जात भए जीअ मो इह ठानी ॥ ॥ सो सुनि बात पपात धरा पर घात भली इह बात बखानी ॥ ॥ ॥ जानुक सेल सुमार लगे छित सोवत सूर वडे अभिमानी ॥२५८॥ ॥ कउन कुजात कुकाज कीयो जिन राघव को इह भांत बखानयो ॥ ॥ लोक अलोक गवाइ दुरानन भूप संघार तहां सुख मानयो ॥ ॥ भरम गयो उड करम करयो घट धरम को तिआगि अधरम प्रमानयो ॥ ॥ ॥ नाक कटी निरलाज निसाचर नाह निपातत नेहु न मानयो ॥२५९॥ ॥ सुमित्रा बाच ॥ ॥ दास को भाव धरे रहीयो सुत मात सरूप सीआ पहिचानो ॥ ॥ तात की तुलि सीआपति कउ करि कै इह बात सही करि मानो ॥ ॥ जेतक कानन के दुख है सभ सो सुख कै तन पै अनमानो ॥ ॥ ॥ राम के पाइ गहे रहीयो बन कै घर को घर कै बनु जानो ॥२६०॥
॥ राजीव लोचन राम कुमार चले बन कउ संगि भ्राति सुहायो ॥ ॥ देव अदेव निछत्र सचीपत चउके चके मन मोद बढायो ॥ ॥ आनन बि्मब परयो बसुधा पर फैलि रहियो फिरि हाथि न आयो ॥ ॥ ॥ बीच अकास निवास कीयो तिन ताही ते नाम मयंक कहायो ॥२६१॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ पित आगिआ ते बन चले तजि ग्रहि राम कुमार ॥ ॥ ॥ संग सीआ म्रिग लोचनी जा की प्रभा अपार ॥२६२॥ ॥ इति स्री राम बनबास दीबो ॥ ॥ अथ बनबास कथनं ॥ ॥ सीता अनुमान बाच ॥ ॥ बिजै छंद ॥ ॥ चंद की अंस चकोरन कै करि मोरन बिद्दुलता अनमानी ॥ ॥ मत्त गइंदन इंद्र बधू भुनसार छटा रवि की जीअ जानी ॥ ॥ देवन दोखन की हरता अर देवन काल क्रिया कर मानी ॥ ॥ ॥ देसन सिंध दिसेसन ब्रिंध जोगेसन गंग कै रंग पछानी ॥२६३॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ उत रघुबर बन को चले सीअ सहित तजि ग्रेह ॥ ॥ ॥ इतै दसा जिह बिधि भई सकल साध सुनि लेह ॥२६४॥ ॥ माता बाच ॥ ॥ कबित ॥ ॥ सभै सुख लै के गए गाड़ो दुख देत भए राजा दसरथ जू कउ कै कै आज पात हो ॥ ॥ अज हूं न छीजै बात मान लीजै राज कीजै कहो काज कउन कौ हमारे स्रोण नात हो ॥ ॥ राजसी के धारौ साज साधन कै कीजै काज कहो रघुराज आज काहे कउ सिधात हो ॥ ॥ ॥ तापसी के भेस कीने जानकी कौ संग लीने मेरे बनबासी मो उदासी दीए जात हो ॥२६५॥ ॥ कारे कारे करि बेस राजा जू कौ छोरि देस तापसी को कै भेस साथि ही सिधारि हौ ॥ ॥ कुल हूं की कान छोरों राजसी के साज तोरों संगि ते न मोरों मुख ऐसो कै बिचारि हौ ॥ ॥ मुंद्रा कान धारौ सारे मुख पै बिभूति डारौं हठि को न हारौं पूत राज साज जारि हौं ॥ ॥ ॥ जुगीआ को कीनो बेस कउसल के छोर देस राजा रामचंद जू के संगि ही सिधारि हौं ॥२६६॥ ॥ अपूरब छंद ॥ ॥ कानने गे राम ॥ ॥ धरम करमं धाम ॥ ॥ लच्छनै लै संगि ॥ ॥ ॥ जानकी सुभंगि ॥२६७॥ ॥ तात तिआगे प्रान ॥ ॥ उतरे बयोमान ॥ ॥ बिच्चरे बिचार ॥ ॥ ॥ मंत्रीयं अपार ॥२६८॥ ॥ बैठयो बसिसटि ॥ ॥ सरब बिप्प इसट ॥ ॥ मुकलियो कागद ॥ ॥ ॥ पट्ठए मागध ॥२६९॥
॥ संकड़ेसा वंत ॥ ॥ मतए मतंत ॥ ॥ मुक्कले के दूत ॥ ॥ ॥ पउन के से पूत ॥२७०॥ ॥ असटन दयंलाख ॥ ॥ दूत गे चरबाख ॥ ॥ भरत आगे जहां ॥ ॥ ॥ जात भे ते तहां ॥२७१॥ ॥ उचरे संदेस ॥ ॥ ऊरध गे अउधेस ॥ ॥ पत्र बाचे भले ॥ ॥ ॥ लाग संगं चले ॥२७२॥ ॥ कोप जीयं जगयो ॥ ॥ धरम भरमं भगयो ॥ ॥ कासमीरं तजयो ॥ ॥ ॥ राम रामं भजयो ॥२७३॥ ॥ पुज्जए अवद्ध ॥ ॥ सूरमा सनद्ध ॥ ॥ हेरिओ अउधेस ॥ ॥ ॥ म्रितकं के भेस ॥२७४॥ ॥ भरथ बाच केकई सों ॥ ॥ लखयो कसूत ॥ ॥ बुल्लयो सपूत ॥ ॥ ध्रिग मईया तोहि ॥ ॥ ॥ लजि लाईया मोहि ॥२७५॥ ॥ का करयो कुकाज ॥ ॥ कयो जीऐ निलाज ॥ ॥ मोहि जैबे तही ॥ ॥ ॥ राम है गे जही ॥२७६॥ ॥ कुसम बचित्र छंद ॥ ॥ तिन बनबासी रघुबर जानै ॥ ॥ दुख सुख सम कर सुख दुख मानै ॥ ॥ बलकल धर कर अब बन जैहैं ॥ ॥ ॥ रघुपत संग हम बन फल खैहैं ॥२७७॥ ॥ इम कहा बचना घर बर छोरे ॥ ॥ बलकल धरि तन भूखन तोरे ॥ ॥ अवधिस जारे अवधहि छाडयो ॥ ॥ ॥ रघुपति पग तर कर घर माडियो ॥२७८॥ ॥ लखि जल थल कह तजि कुल धाए ॥ ॥ मनु मन संगि लै तिह ठां आए ॥ ॥ लखि बल रामं खल दल भीरं ॥ ॥ ॥ गहि धन पाणं सित धर तीरं ॥२७९॥ ॥ गहि धनु रामं सर बर पूरं ॥ ॥ अरबर थहरे खल दल सूरं ॥ ॥ नर बर हरखे घर घर अमरं ॥ ॥ ॥ अमररि धरके लहि करि समरं ॥२८०॥ ॥ तब चित अपने भरथर जानी ॥ ॥ रन रंग राते रघुबर मानी ॥ ॥ दल बल तजि करि इकले निसरे ॥ ॥ ॥ रघुबर निरखे सभ दुख बिसरे ॥२८१॥ ॥ द्रिग जब निरखे भट मण रामं ॥ ॥ सिर धर टेकयं तज कर कामं ॥ ॥ इम गति लखि कर रघुपति जानी ॥ ॥ ॥ भरथर आए तजि रजधानी ॥२८२॥ ॥ रिपहा निरखे भरथर जाने ॥ ॥ अवधिस मूए तिन मान माने ॥ ॥ रघुबर लछमन परहर बानं ॥ ॥ ॥ गिर तर आए तज अभिमानं ॥२८३॥ ॥ दल बल तजि करि मिलि गल रोए ॥ ॥ दुख कसि बिधि दीआ सुख सभ खोए ॥ ॥ अब घर चलीए रघुबर मेरे ॥ ॥ ॥ तजि हठि लागे सभ पग तेरे ॥२८४॥ ॥ राम बाच भरथ सों ॥ ॥ कंठ अभूखन छंद ॥ ॥ भरथ कुमार न अउहठ कीजै ॥ ॥ जाह घरै न हमै दुख दीजै ॥ ॥ राज कहयो जु हमै हम मानी ॥ ॥ ॥ त्रियोदस बरख बसै बन धानी ॥२८५॥ ॥ त्रियोदस बरख बितै फिरि ऐहैं ॥ ॥ राज संघासन छत्र सुहैहैं ॥ ॥ जाहु घरै सिख मान हमारी ॥ ॥ ॥ रोवत तोरि उतै महतारी ॥२८६॥
॥ भरथ बाच राम प्रति ॥ ॥ कंठ अभूखन छंद ॥ ॥ जाउ कहा पग भेट कहउ तुह ॥ ॥ लाज न लागत राम कहो मुह ॥ ॥ मै अति दीन मलीन बिना गत ॥ ॥ ॥ राख लै राज बिखै चरनाम्रित ॥२८७॥ ॥ चछ बिहीन सुप्पछ जिमं कर ॥ ॥ तिउ प्रभ तीर गिरयो पग भरथर ॥ ॥ अंक रहे गह राम तिसै तब ॥ ॥ ॥ रोइ मिले लछनादि भया सभ ॥२८८॥ ॥ पानि पीआइ जगाइ सु बीरह ॥ ॥ फेरि कहयो हस स्री रघुबीरह ॥ ॥ त्रियोदस बरख गए फिरि ऐहै ॥ ॥ ॥ जाहु हमै कछु काज किवैहै ॥२८९॥ ॥ चीन गए चतुरा चित मो सभ ॥ ॥ स्री रघुबीर कही अस कै जब ॥ ॥ मात समोध सु पावरि लीनी ॥ ॥ ॥ अउर बसे पुर अउध न चीनी ॥२९०॥ ॥ सीस जटान को जूट धरे बर ॥ ॥ राज समाज दीयो पऊवा पर ॥ ॥ राज करे दिनु होत उजिआरै ॥ ॥ ॥ रैनि भए रघुराज स्मभारै ॥२९१॥ ॥ जजर भयो झुर झंझर जिउ तन ॥ ॥ राखत स्री रघुराज बिखै मन ॥ ॥ बैरिन के रन बिंद निकंदत ॥ ॥ ॥ भाखत कंठि अभूखन छंदत ॥२९२॥ ॥ झूला छंद ॥ ॥ इतै राम राजं ॥ ॥ करै देव काजं ॥ ॥ धरो बान पानं ॥ ॥ ॥ भरै बीर मानं ॥२९३॥ ॥ जहां साल भारे ॥ ॥ द्रुमं ताल नयारे ॥ ॥ छुए सुरग लोकं ॥ ॥ ॥ हरै जात सोकं ॥२९४॥ ॥ तहां राम पैठे ॥ ॥ महांबीर ऐठे ॥ ॥ लीए संगि सीता ॥ ॥ ॥ महां सुभ्र गीता ॥२९५॥ ॥ बिधुं बाक बैणी ॥ ॥ म्रिगी राज नैणी ॥ ॥ कटं छीन दे सी ॥ ॥ ॥ परी पदमनी सी ॥२९६॥ ॥ झूलना छंद ॥ ॥ चड़ै पान बानी धरे सान मानो चछा बान सोहै दोऊ राम रानी ॥ ॥ फिरै खिआल सो एक हवाल सेती छुटे इंद्र सेती मनो इंद्र धानी ॥ ॥ मनो नाग बांके लजी आब फांकै रंगे रंग सुहाब सौ राम बारे ॥ ॥ ॥ म्रिगा देखि मोहे लखे मीन रोहे जिनै नैक चीने तिनो प्रान वारे ॥२९७॥ ॥ सुने कूक के कोकला कोप कीने मुखं देख कै चंद दारेर खाई ॥ ॥ लखे नैन बांके मनै मीन मोहै लखे जात के सूर की जोति छाई ॥ ॥ मनो फूल फूले लगे नैन झूले लखे लोग भूले बने जोर ऐसे ॥ ॥ ॥ लखे नैन थारे बिधे राम पिआरे रंगे रंग साराब सुहाब जैसे ॥२९८॥ ॥ रंगे रंग राते मयं मत माते मकबूलि गुलाब के फूल सोहैं ॥ ॥ नरगस ने देख कै नाक ऐंठा म्रिगीराज के देखतैं मान मोहैं ॥ ॥ सबो रोज सराब ने सोर लाइआ प्रजा आम जाहान के पेख वारे ॥ ॥ ॥ भवा तान कमान की भांत पिआरीनि कमान ही नैन के बान मारे ॥२९९॥
॥ कबित ॥ ॥ ऊचे द्रुम साल जहां लांबे बट ताल तहां ऐसी ठउर तप कउ पधारै ऐसो कउन है ॥ ॥ जा की छब देख दुत खांडव की फीकी लागै आभा तकी नंदन बिलोक भजे मौन है ॥ ॥ तारन की कहा नैक नभ न निहरायो जाइ सूरज की जोत तहां चंद्रकी न जउन है ॥ ॥ ॥ देव न निहारयो कोऊ दैत न बिहारयो तहां पंछी की न गम जहां चीटी को न गउन है ॥३००॥ ॥ अपूरब छंद ॥ ॥ लखीए अलक्ख ॥ ॥ तकीए सुभच्छ ॥ ॥ धायो बिराध ॥ ॥ ॥ बंकड़यो बिबाद ॥३०१॥ ॥ लखीअं अवद्ध ॥ ॥ स्मबहयो सनद्ध ॥ ॥ समले हथिआर ॥ ॥ ॥ उरड़े लुझार ॥३०२॥ ॥ चिकड़ी चावंड ॥ ॥ समुहे सावंत ॥ ॥ सजीए सुबाह ॥ ॥ ॥ अच्छरो उछाह ॥३०३॥ ॥ प्खरे पवंग ॥ ॥ मोहले मतंग ॥ ॥ चावडी चिंकार ॥ ॥ ॥ उझरे लुझार ॥३०४॥ ॥ सिंधरे संधूर ॥ ॥ बज्जए तंदूर ॥ ॥ सजीए सुबाह ॥ ॥ ॥ अच्छरो उछाह ॥३०५॥ ॥ बिझुड़े उझाड़ ॥ ॥ समले सुमार ॥ ॥ हाहले हंकार ॥ ॥ ॥ अंकड़े अंगार ॥३०६॥ ॥ समले लुझार ॥ ॥ छुट्टके बिसियार ॥ ॥ हाहलेहं बीर ॥ ॥ ॥ संघरे सु बीर ॥३०७॥ ॥ अनूप नराज छंद ॥ ॥ गजं गजे हयं हले हला हली हलो हलं ॥ ॥ बबज्ज सिंधरे सुरं छुटंत बाण केवलं ॥ ॥ पप्क प्खरे तुरे भभक्ख घाइ निरमलं ॥ ॥ ॥ पलुत्थ लुत्थ बित्थरी अमत्थ जुत्थ उत्थलं ॥३०८॥ ॥ अजुत्थ लुत्थ बित्थरी मिलंत हत्थ बक्खयं ॥ ॥ अघुम घाइ घुम ए बबक्क बीर दुद्धरं ॥ ॥ किलं करंत खप्परी पिपंत स्रोण पाणयं ॥ ॥ ॥ हहक्क भैरवं स्रुतं उठंत जुद्ध ज्वालयं ॥३०९॥ ॥ फिकंत फिंकती फिरं रड़ंत गिद्ध ब्रिद्धणं ॥ ॥ डहक्क डामरी उठं बकार बीर बैतलं ॥ ॥ खहत खग्ग खत्रीयं खिमंत धार उज्जलं ॥ ॥ ॥ घणंक जाण सावलं लसंत बेग बिज्जुलं ॥३१०॥ ॥ पिपंत स्रोण खप्परी भखंत मास चावडं ॥ ॥ हकार वीर स्मभिड़ै लुझार धार दुद्धरं ॥ ॥ पुकार मार कै परे सहंत अंग भारयं ॥ ॥ ॥ बिहार देव मंडलं कटंत खग्ग धारयं ॥३११॥ ॥ प्रचार वार पैज कै खुमारि घाइ घूमही ॥ ॥ तपी मनो अधो मुखं सु धूम आग धूम ही ॥ ॥ तुटंत अंग भंगयं बहंत असत्र धारयं ॥ ॥ ॥ उठंत छिच्छ इच्छयं पिपंत मास हारयं ॥३१२॥ ॥ अघोर घाइ अघए कटे परे सु प्रासनं ॥ ॥ घुमंत जाण रावलं लगे सु सिद्ध आसणं ॥ ॥ परंत अंग भंग हुइ बकंत मार मारयं ॥ ॥ ॥ बदंत जाण बंदीयं सुक्रित क्रित अपारयं ॥३१३॥
॥ बजंत ताल त्मबूरं बिसेख बीन बेणयं ॥ ॥ म्रिदंग झालना फिरं सनाइ भेर भै करं ॥ ॥ उठंत नादि निरमलं तुटंत ताल तत्थियं ॥ ॥ ॥ बदंत कित्त बंदीअं कबिंद्र काबय कत्थियं ॥३१४॥ ॥ ढलंत ढाल मालयं खहंत खग्ग खेतयं ॥ ॥ चलंत बाण तीछणं अनंत अंत कंकयं ॥ ॥ सिमट्टि सांग सुंकड़ं सटक्क सूल सेलयं ॥ ॥ ॥ रुलंत रुंड मुंडयं झलंत झाल अझलं ॥३१५॥ ॥ बचित्र चित्रतं सरं बहंत दारुणं रणं ॥ ॥ ढलंत ढाल अढलं ढुलंत चारु चामरं ॥ ॥ दलंत निरदलो दलं पपात भूतलं दितं ॥ ॥ ॥ उठंत गद्दि सद्दयं निनद्दि नद्दि दुभरं ॥३१६॥ ॥ भरंत पत्र चउसठी किलंक खेचरी करं ॥ ॥ फिरंत हूर पूरयं बरंत दुद्धरं नरं ॥ ॥ सनद्ध बद्ध गोधयं सु सोभ अंगुलं त्रिणं ॥ ॥ ॥ डकंत डाकणी भ्रमं भखंत आमिखं रणं ॥३१७॥ ॥ किलंक देवीयं करंड हक्क डामरू सुरं ॥ ॥ कड़क्क कतीयं उठं परंत धूर प्खरं ॥ ॥ बबजि सिंधरे सुरं न्रिघात सूल सैहथीयं ॥ ॥ ॥ भभजि कातरो रणं निलज्ज भज्ज भू भरं ॥३१८॥ ॥ सु ससत्र असत्र संनिधं जुझंत जोधणो जुद्धं ॥ ॥ अरुझ पंक लज्जणं करंत द्रोह केवलं ॥ ॥ परंत अंग भंग हुऐ उठंत मास करदमं ॥ ॥ ॥ खिलंत जाणु कदवं सु मझ कान्ह गोपिकं ॥३१९॥ ॥ डहक्क डउर डाकणं झलंत झाल रोसुरं ॥ ॥ निनद्द नाद नाफिरं बजंत भेरि भीखणं ॥ ॥ घुरंत घोर दुंदभी करंत कानरे सुरं ॥ ॥ ॥ करंत झाझरो झड़ं बजंत बांसुरी बरं ॥३२०॥ ॥ नचंत बाज तीछणं चलंत चाचरी क्रितं ॥ ॥ लिखंत लीक उरबीअं सुभंत कुंडली करं ॥ ॥ उडंत धूर भूरियं खुरीन निरदली नभं ॥ ॥ ॥ परंत भूर भउरणं सु भउर ठउर जिउ जलं ॥३२१॥ ॥ भजंत धीर बीरणं चलंत मान प्रान लै ॥ ॥ दलंत पंत दंतीयं भजंत हार मान कै ॥ ॥ मिलंत दांत घास लै ररच्छ सबद उचरं ॥ ॥ ॥ बिराध दानवं जुझयो सु हत्थि राम निरमलं ॥३२२॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामवतार कथा बिराध दानव बधह ॥ ॥ अथ बन मो प्रवेस कथनं ॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ इह बिधि मार बिराध कउ बन मे धसे निसंग ॥ ॥ ॥ सु कबि सयाम इह बिधि कहियो रघुबर जुद्ध प्रसंग ॥३२३॥ ॥ सुखदा छंद ॥ ॥ रिख अगसत धाम ॥ ॥ गए राज राम ॥ ॥ धुज धरम धाम ॥ ॥ ॥ सीआ सहित बाम ॥३२४॥
॥ लखि राम बीर ॥ ॥ रिख दीन तीर ॥ ॥ रिप सरब चीर ॥ ॥ ॥ हरि सरब पीर ॥३२५॥ ॥ रिखि बिदा कीन ॥ ॥ आसिखा दीन ॥ ॥ दुत राम चीन ॥ ॥ ॥ मुनि मन प्रबीन ॥३२६॥ ॥ प्रभ भ्रात संगि ॥ ॥ सीअ संग सुरंग ॥ ॥ तजि चिंत अंग ॥ ॥ ॥ धस बन निसंग ॥३२७॥ ॥ धरि बान पान ॥ ॥ कटि कसि क्रिपान ॥ ॥ भुज बर अजान ॥ ॥ ॥ चल तीरथ नान ॥३२८॥ ॥ गोदावरि तीर ॥ ॥ गए सहित बीर ॥ ॥ तज राम चीर ॥ ॥ ॥ कीअ सुच सरीर ॥३२९॥ ॥ लखि राम रूप ॥ ॥ अतिभुत अनूप ॥ ॥ जह हुती सूप ॥ ॥ ॥ तह गए भूप ॥३३०॥ ॥ कही ताहि धाति ॥ ॥ सुनि सूप बाति ॥ ॥ दुऐ अतिथ नात ॥ ॥ ॥ लहि अनूप गात ॥३३१॥ ॥ सुंदरी छंद ॥ ॥ सूपनखा इह भांति सुनी जब ॥ ॥ धाइ चली अबिल्मब त्रिया तब ॥ ॥ काम सरूप कलेवर जानै ॥ ॥ ॥ रूप अनूप तिहूं पुर मानै ॥३३२॥ ॥ धाइ कहयो रघुराइ भए तिह ॥ ॥ जैस न्रिलाज कहै न कोऊ किह ॥ ॥ हउ अटकी तुमरी छबि के बर ॥ ॥ ॥ रंग रंगी रंगए द्रिग दूपर ॥३३३॥ ॥ राम बाच ॥ ॥ सुंदरी छंद ॥ ॥ जाह तहां जह भ्राति हमारे ॥ ॥ वै रिझहै लख नैन तिहारे ॥ ॥ संग सीआ अविलोक क्रिसोदर ॥ ॥ ॥ कैसे कै राख सको तुम कउ घरि ॥३३४॥ ॥ मात पिता कह मोह तजयो मन ॥ ॥ संग फिरी हमरे बन ही बन ॥ ॥ ताहि तजौ कस कै सुनि सुंदर ॥ ॥ ॥ जाहु तहां जहां भ्रात क्रिसोदरि ॥३३५॥ ॥ जात भई सुन बैन त्रिया तह ॥ ॥ बैठ हुते रणधीर जती जह ॥ ॥ सो न बरै अति रोस भरी तब ॥ ॥ ॥ नाक कटाइ गई ग्रिह को सभ ॥३३६॥ ॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके राम अवतार कथा सूपनखा को नाक काटबो धयाइ समापतम सतु सुभम सतु ॥५॥ ॥ अथ खरदूखन दईत जुद्ध कथनं ॥ ॥ सुंदरी छंद ॥ ॥ रावन तीर रुरोत भई जब ॥ ॥ रोस भरे दनु बंस बली सभ ॥ ॥ लंकस धीर बजीर बुलाए ॥ ॥ ॥ दूखन औ खर दईत पठाए ॥३३७॥ ॥ साज सनाह सुबाह दुरं गत ॥ ॥ बाजत बाज चले गज गज्जत ॥ ॥ मार ही मार दसो दिस कूके ॥ ॥ ॥ सावन की घट जयों घुर ढूके ॥३३८॥ ॥ गज्जत है रणबीर महां मन ॥ ॥ तज्जत हैं नही भूमि अयोधन ॥ ॥ छाजत है चख स्रोणत सो सर ॥ ॥ ॥ नादि करैं किलकार भयंकर ॥३३९॥
॥ तारका छंद ॥ ॥ रनि राज कुमार बिरच्चहिगे ॥ ॥ सर सेल सरासन नच्चहिगे ॥ ॥ सु बिरुद्ध अवद्धि सु गाजहिगे ॥ ॥ ॥ रण रंगहि राम बिराजहिगे ॥३४०॥ ॥ सर ओघ प्रओघ प्रहारैगे ॥ ॥ रणि रंग अभीत बिहारैगे ॥ ॥ सर सूल सनाहरि छुट्टहिगे ॥ ॥ ॥ दित पुत्र परा पर लुट्टहिगे ॥३४१॥ ॥ सर संक असंकत बाहहिगे ॥ ॥ बिनु भीत भया दल दाहहिगे ॥ ॥ छिति लुत्थ बिलुत्थ बिथारहिगे ॥ ॥ ॥ तरु सणै समूल उपारहिगे ॥३४२॥ ॥ नव नाद नफीरन बाजत भे ॥ ॥ गल गजि हठी रण रंग फिरे ॥ ॥ लगि बान सनाह दुसार कढे ॥ ॥ ॥ सूअ तच्छक के जनु रूप मढे ॥३४३॥ ॥ बिनु संक सनाहरि झारत है ॥ ॥ रणबीर नवीर प्रचारत है ॥ ॥ सर सुद्ध सिला सित छोरत है ॥ ॥ ॥ जीअ रोस हलाहल घोरत है ॥३४४॥ ॥ रन धीर अयोधनु लुझत हैं ॥ ॥ रद पीस भलो कर जुझत हैं ॥ ॥ रण देव अदेव निहारत हैं ॥ ॥ ॥ जय सद्द निनद्दि पुकारत हैं ॥३४५॥ ॥ गण गिद्धण ब्रिद्ध रड़ंत नभं ॥ ॥ किलकंत सु डाकण उच्च सुरं ॥ ॥ भ्रम छाड भकारत भूत भूअं ॥ ॥ ॥ रण रंग बिहारत भ्रात दूअं ॥३४६॥ ॥ खरदूखण मार बिहाइ दए ॥ ॥ जय सद्द निनद्द बिहद्द भए ॥ ॥ सुर फूलन की बरखा बरखे ॥ ॥ ॥ रण धीर अधीर दोऊ परखे ॥३४७॥ ॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके राम अवतार कथा खर दूखण दईत बधह धिआइ समापतम सतु ॥६॥ ॥ अथ सीता हरन कथनं ॥ ॥ मनोहर छंद ॥ ॥ रावण नीच मरीच हूं के ग्रिह बीच गए बद्ध बीर सुनैहै ॥ ॥ बीसहूं बांहि हथिआर गहे रिस मार मनै दस सीस धुनै है ॥ ॥ नाक कटयो जिन सूपनखा कहतउ तिह को दुख दोख लगै है ॥ ॥ ॥ रावल को बनु कै पल मो छल कै तिह की घरनी धरि लयै है ॥३४८॥ ॥ मरीच बाच ॥ ॥ मनोहर छंद ॥ ॥ नाथ अनाथ सनाथ कीयो करि कै अति मोर क्रिपा कह आए ॥ ॥ भउन भंडार अटी बिकटी प्रभ आज सभै घर बार सुहाए ॥ ॥ द्वै करि जोर करउ बिनती सुनि कै न्रिपनाथ बुरो मत मानो ॥ ॥ ॥ स्री रघुबीर सही अवतार तिनै तुम मानस कै न पछानो ॥३४९॥
॥ रोस भरयो सभ अंग जरयो मुख रत्त करयो जुग नैन तचाए ॥ ॥ तै न लगै हमरे सठ बोलन मानस दुऐ अवतार गनाए ॥ ॥ मात की एक ही बात कहे तजि तात घ्रिणा बनबास निकारे ॥ ॥ ॥ ते दोऊ दीन अधीन जुगीया कस कै भिरहैं संग आन हमारे ॥३५०॥ ॥ जउ नही जात तहां कह तै सठि तोर जटान को जूट पटै हौ ॥ ॥ कंचन कोट के ऊपर ते डर तोहि नदीसर बीच डुबै हौ ॥ ॥ चित्त चिरात बसात कछू न रिसात चलयो मुन घात पछानी ॥ ॥ ॥ रावन नीच की मीच अधोगत राघव पान पुरी सुरि मानी ॥३५१॥ ॥ कंचन को हरना बन के रघुबीर बली जह थो तह आयो ॥ ॥ रावन ह्वै उत के जुगीआ सीअ लैन चलयो जनु मीच चलायो ॥ ॥ सीअ बिलोक कुरंक प्रभा कह मोहि रही प्रभ तीर उचारी ॥ ॥ ॥ आन दिजै हम कउ म्रिग वासुन स्री अवधेस मुकंद मुरारी ॥३५२॥ ॥ राम बाच ॥ ॥ सीअ म्रिगा कहूं कंचन को नहि कान सुनयो बिधि नै न बनायो ॥ ॥ बीस बिसवे छल दानव को बन मै जिह आन तुमै डहकायो ॥ ॥ पिआरी को आइस मेट सकै न बिलोक सीआ कहु आतुर भारी ॥ ॥ ॥ बांध निखंग चले कटि सौ कहि भ्रात ईहां करिजै रखवारी ॥३५३॥ ॥ ओट थकयो करि कोटि निसाचर स्री रघुबीर निदान संघारयो ॥ ॥ हे लहु बीर उबार लै मोकह यौ कहि कै पुनि राम पुकारयो ॥ ॥ जानकी बोल कुबोल सुनयो तब ही तिह ओर सुमित्र पठायो ॥ ॥ ॥ रेख कमान की काढ महाबल जात भए इत रावन आयो ॥३५४॥ ॥ भेख अलेख उचार कै रावण जात भए सीअ के ढिग यौ ॥ ॥ अविलोक धनी धनवान बडो तिह जाइ मिलै मग मो ठग जयो ॥ ॥ कछु देहु भिछा म्रिग नैन हमै इह रेख मिटाइ हमै अब ही ॥ ॥ ॥ बिनु रेख भई अविलोक लई हरि सीअ उडयो नभि कउ तब ही ॥३५५॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटक राम वतार कथा सीता हरन धिआइ समापतम ॥ ॥ अथ सीता खोजबो कथनं ॥ ॥ तोटक छंद ॥ ॥ रघुनाथ हरी सीअ हेर मनं ॥ ॥ गहि बान सिला सित सजि धनं ॥ ॥ चहूं ओर सुधार निहार फिरे ॥ ॥ ॥ छित ऊपर स्री रघुराज गिरे ॥३५६॥
॥ लघु बीर उठाइ सु अंक भरे ॥ ॥ मुख पोछ तबै बचना उचरे ॥ ॥ कस अधीर परे प्रभ धीर धरो ॥ ॥ ॥ सीअ जाइ कहा तिह सोध करो ॥३५७॥ ॥ उठ ठांढि भए फिरि भूम गिरे ॥ ॥ पहरेकक लउ फिर प्रान फिरे ॥ ॥ तन चेत सुचेत उठे हरि यौं ॥ ॥ ॥ रण मंडल मद्धि गिरयो भट जयों ॥३५८॥ ॥ छहूं ओर पुकार बकार थके ॥ ॥ लघु भ्रात बहु भांति झथे ॥ ॥ उठ कै पुन प्रात इसनान गए ॥ ॥ ॥ जल जंत सभै जरि छारि भए ॥३५९॥ ॥ बिरही जिह ओर सु दिसट धरै ॥ ॥ फल फूल पलास अकास जरै ॥ ॥ कर सौ धर जउन छुअंत भई ॥ ॥ ॥ कच बासन जयों पक फूट गई ॥३६०॥ ॥ जिह भूम थली पर राम फिरे ॥ ॥ दव जयों जल पात पलास गिरे ॥ ॥ टुट आसू आरण नैन झरी ॥ ॥ ॥ मनो तात तवा पर बूंद परी ॥३६१॥ ॥ तन राघव भेट समीर जरी ॥ ॥ तज धीर सरोवर सांझ दुरी ॥ ॥ नहि तत्र थली सत पत्र रहे ॥ ॥ ॥ जल जंत परत्रिन पत्र दहे ॥३६२॥ ॥ इत ढूंढ बने रघुनाथ फिरे ॥ ॥ उत रावन आन जटायु घिरे ॥ ॥ रण छोर हठी पग दुऐ न भजयो ॥ ॥ ॥ उड पच्छ गए पै न पच्छ तजयो ॥३६३॥ ॥ गीता मालती छंद ॥ ॥ पछराज रावन मारि कै रघुराज सीतहि लै गयो ॥ ॥ नभि ओर खोर निहार कै सु जटाउ सीअ संदेस दयो ॥ ॥ तब जान राम गए बली सीअ सत्त रावन ही हरी ॥ ॥ ॥ हनवंत मारग मो मिले तब मित्रता ता सों करी ॥३६४॥ ॥ तिन आन स्री रघुराज के कपिराज पाइन डारयो ॥ ॥ तिन बैठ गैठ इकैठ ह्वै इह भांति मंत्र बिचारयो ॥ ॥ कपि बीर धीर सधीर के भट मंत्र बीर बिचार कै ॥ ॥ ॥ अपनाइ सुग्रिव कउ चलु कपिराज बाल संघार कै ॥३६५॥ ॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे बाल बधह धिआइ समापतम ॥८॥ ॥ अथ हनूमान सोध को पठैबो ॥ ॥ गीता मालती छंद ॥ ॥ दल बांट चार दिसा पठयो हनवंत लंक पठै दए ॥ ॥ लै मुद्रका लख बारिधै जह सी हुती तह जात भे ॥ ॥ पुर जारि अच्छ कुमार छै बन टारि कै फिर आइयो ॥ ॥ ॥ क्रित चार जो अमरारि को सभ राम तीर जताइयो ॥३६६॥
॥ दल जोर कोर करोर लै बड घोर तोर सभै चले ॥ ॥ रामचंद्र सुग्रीव लछमन अउर सूर भले भले ॥ ॥ जामवंत सुखैन नील हणवंत अंगद केसरी ॥ ॥ ॥ कपि पूत जूथ पजूथ लै उमडे चहूं दिस कै झरी ॥३६७॥ ॥ पाटि बारिध राज कउ करि बाटि लांघ गए जबै ॥ ॥ दूत दईतन के हुते तब दउर रावन पै गए ॥ ॥ रन साज बाज सभै करो इक बेनती मन मानीऐ ॥ ॥ ॥ गड़ लंक बंक स्मभारीऐ रघुबीर आगम जानीऐ ॥३६८॥ ॥ धूम्र अच्छ सु जांबमाल बुलाइ वीर पठै दए ॥ ॥ सोर कोर क्रोर कै जहां राम थे तहां जात भे ॥ ॥ रोस कै हनवंत था पग रोप पाव प्रहारीयं ॥ ॥ ॥ जूझि भूमि गिरयो बली सुर लोक मांझि बिहारीयं ॥३६९॥ ॥ जांबमाल भिरे कछू पुन मारि ऐसे ई कै लए ॥ ॥ भाज कीन प्रवेस लंक संदेस रावन सो दए ॥ ॥ धूमराछ सु जांबमाल दुहहूं राघव जू हरिओ ॥ ॥ ॥ है कछू प्रभु के हीए सुभ मंत्र आवत सो करो ॥३७०॥ ॥ पेख तीर अक्मपनै दल संगि दै सु पठै दयो ॥ ॥ भांति भांति बजे बजंत्र निनद्द सद्द पुरी भयो ॥ ॥ सुर राइ आदि प्रहसत ते इह भांति मंत्र बिचारियो ॥ ॥ ॥ सीअ दे मिलो रघुराज को कस रोस राव स्मभारियो ॥३७१॥ ॥ छपय छंद ॥ ॥ झल हलंत तरवार बजत बाजंत्र महा धुन ॥ ॥ खड़ हड़ंत खह खोल धयान तजि परत चवध मुन ॥ ॥ इक्क इक्क लै चलै इक्क तन इक्क अरुझै ॥ ॥ अंध धुंध पर गई हत्थि अर मुक्ख न सुझै ॥ ॥ सुमुहे सूर सावंत सभ फउज राज अंगद समर ॥ ॥ ॥ जै सद्द निनद्द बिहद्द हूअ धनु ज्मपत सुरपुर अमर ॥३७२॥ ॥ इत अंगद युवराज दुतीअ दिस बीर अक्मपन ॥ ॥ करत ब्रिसट सर धार तजत नही नैक अयोधन ॥ ॥ हत्थ बत्थ मिल गई लुत्थ बित्थरी अहाड़ं ॥ ॥ घुमे घाइ अघाइ बीर बंकड़े बबाड़ं ॥ ॥ पिक्खत बैठ बिबाण बर धंन धंन ज्मपत अमर ॥ ॥ ॥ भव भूत भविक्खय भवान मो अब लग लखयो न अस समर ॥३७३॥ ॥ कहूं मुंड पिखीअह कहूं भक रुंड परे धर ॥ ॥ कितही जांघ तरफंत कहूं उछरंत सु छब कर ॥ ॥ भरत पत्र खेचरं कहूं चावंड चिकारैं ॥ ॥ किलकत कतह मसान कहूं भैरव भभकारैं ॥ ॥ इह भांति बिजै कपि की भई हणयो असुर रावण तणा ॥ ॥ ॥ भै दग्ग अदग्ग भग्गे हठी गहि गहि कर दांतन त्रिणा ॥३७४॥
॥ उतै दूत रावणै जाइ हत बीर सुणायो ॥ ॥ इत कपिपत अरु राम दूत अंगदहि पठायो ॥ ॥ कही कत्थ तिह सत्थ गत्थ करि तत्थ सुनायो ॥ ॥ मिलहु देहु जानकी काल नातर तुहि आयो ॥ ॥ पग भेट चलत भयो बाल सुत प्रिसट पान रघुबर धरे ॥ ॥ ॥ भर अंक पुलकत न सपजियो भांत अनिक आसिख करे ॥३७५॥ ॥ प्रति उत्तर स्मबाद ॥ ॥ छपै छंद ॥ ॥ देह सीआ दसकंध छाहि नही देखन पैहो ॥ ॥ लंक छीन लीजीऐ लंक लखि जीत न जैहो ॥ ॥ क्रुद्ध बिखै जिन घोरु पिख कस जुद्धु मचै है ॥ ॥ राम सहित कपि कटक आज म्रिग सयार खवै है ॥ ॥ जिन कर सु गरबु सुण मूड़ मत गरब गवाइ घनेर घर ॥ ॥ ॥ बस करे सरब घर गरब हम ए किन महि द्वै दीन नर ॥३७६॥ ॥ रावन बाच अंगद सो ॥ ॥ छपै छंद ॥ ॥ अगन पाक कह करै पवन मुर बार बुहारै ॥ ॥ चवर चंद्रमा धरै सूर छत्रहि सिर ढारै ॥ ॥ मद लछमी पिआवंत बेद मुख ब्रहमु उचारत ॥ ॥ बरन बार नित भरे और कुलुदेव जुहारत ॥ ॥ निज कहति सु बल दानव प्रबल देत धनुदि जछ मोहि कर ॥ ॥ ॥ वे जुद्ध जीत ते जांहिगे कहां दोइ ते दीन नर ॥३७७॥ ॥ कहि हारयो कपि कोटि दईत पति एक न मानी ॥ ॥ उठत पाव रुपियो सभा मधि सो अभिमानी ॥ ॥ थके सकल असुरार पाव किनहूं न उचक्कयो ॥ ॥ गिरे धरन मुरछाइ बिमन दानव दल थक्कयो ॥ ॥ लै चलयो बभीछन भ्रात तिह बाल पुत्र धूसर बरन ॥ ॥ ॥ भट हटक बिकट तिह ना सके चलि आयो जित राम रन ॥३७८॥ ॥ कहि बुलयो लंकेस ताहि प्रभ राजीव लोचन ॥ ॥ कुटल अलक मुख छके सकल संतन दुख मोचन ॥ ॥ कुपै सरब कपिराज बिजै पहली रण चक्खी ॥ ॥ फिरै लंक गड़ि घेरि दिसा दच्छणी परखी ॥ ॥ प्रभ करै बभीछन लंकपति सुणी बाति रावण घरणि ॥ ॥ ॥ सुद्धि सत्त तब्बि बिसरत भई गिरी धरण पर हुऐ बिमण ॥३७९॥ ॥ मदोदरी बाच ॥ ॥ उटंङण छंद ॥ ॥ सूरबीरा सजे घोर बाजे बजे भाज कंता सुणे राम आए ॥ ॥ बाल मारयो बली सिंध पाटयो जिनै ताहि सौ बैरि कैसे रचाए ॥ ॥ बयाध जीतयो जिनै ज्मभ मारयो उनै राम अउतार सोई सुहाए ॥ ॥ ॥ दे मिलो जानकी बात है सिआन की चाम के दाम काहे चलाए ॥३८०॥
॥ रावण बाच ॥ ॥ बयूह सैना सजो घोर बाजे बजो कोटि जोधा गजो आन नेरे ॥ ॥ साज संजोअ स्मबूह सैना सभै आज मारो तरै द्रिसटि तेरे ॥ ॥ इंद्र जीतो करो जच्छ रीतो धनं नारि सीता बरं जीत जुद्धै ॥ ॥ ॥ सुरग पाताल आकास जुआला जरै बाचि है राम का मोर क्रूद्धै ॥३८१॥ ॥ मदोदरी बाच ॥ ॥ तारका जात ही घात कीनी जिनै अउर सुबाह मारीच मारे ॥ ॥ बयाध बद्धयो खरंदूखणं खेत थै एक ही बाण सों बाल मारे ॥ ॥ धुम्र अच्छाद अउ जांबुमाली बली प्राण हीणं करयो जुद्ध जै कै ॥ ॥ ॥ मारिहैं तोहि यौ सयार के सिंघ जयो लेहिगे लंक को डंक दै कै ॥३८२॥ ॥ रावण बाच ॥ ॥ चउर चंद्रं करं छत्र सूरं धरं बेद ब्रहमा ररं दुआर मेरे ॥ ॥ पाक पावक करं नीर बरणं भरं जच्छ बिद्दिआधरं कीन चेरे ॥ ॥ अरब खरबं पुरं चरब सरबं करे देखु कैसे करौ बीर खेतं ॥ ॥ ॥ चिंक है चावडा फिंक है फिक्करी नाच है बीर बैताल प्रेतं ॥३८३॥ ॥ मदोदरी बाच ॥ ॥ तास नेजे ढुलै घोर बाजे बजै राम लीने दलै आन ढूके ॥ ॥ बानरी पूत चिंकार अपारं करं मार मारं चहूं ओर कूके ॥ ॥ भीम भेरी बजै जंग जोधा गजै बान चापै चलै नाहि जउ लौ ॥ ॥ ॥ बात को मानीऐ घातु पहिचानीऐ रावरी देह की सांत तउ लौ ॥३८४॥ ॥ घाट घाटै रुकौ बाट बाटै तुपो ऐंठ बैठे कहा राम आए ॥ ॥ खोर हराम हरीफ की आंख तै चाम के जात कैसे चलाए ॥ ॥ होइगो खुआर बिसीआर खाना तुरा बानरी पूत जउ लौ न गजि है ॥ ॥ ॥ लंक को छाडि कै कोटि के फांध कै आसुरी पूत लै घासि भजि है ॥३८५॥ ॥ रावण बाच ॥ ॥ बावरी रांड किआ भांडि बातै बकै रंक से राम का छोड रासा ॥ ॥ काढहो बासि दै बान बाजीगरी देखिहो आज ता को तमासा ॥ ॥ बीस बाहे धरं सीस दसयं सिरं सैण स्मबूह है संगि मेरे ॥ ॥ ॥ भाज जै है कहां बाटि पैहैं ऊहां मारिहौ बाज जैसे बटेरे ॥३८६॥ ॥ एक एकं हिरैं झूम झूमं मरैं आपु आपं गिरैं हाकु मारे ॥ ॥ लाग जैहउ तहां भाज जैहै जहां फूल जैहै कहां तै उबारे ॥ ॥ साज बाजे सभै आज लैहउं तिनै राज कैसो करै काज मो सो ॥ ॥ ॥ बानरं छै करो राम लच्छै हरो जीत हौ होड तउ तान तो सो ॥३८७॥
॥ कोटि बातै गुनी एक कै ना सुनी कोपि मुंडी धुनी पुत्त पठ्ठै ॥ ॥ एक नारांत देवांत दूजो बली भूम क्मपी रण्मबीर उठ्ठै ॥ ॥ सार भारं परे धार धारं बजी क्रोह कै लोह की छिट्ट छुट्टैं ॥ ॥ ॥ रुंड धुकधुक परै घाइ भकभक करै बित्थरी जुत्थ सो लुत्थ लुट्टैं ॥३८८॥ ॥ पत्र जुग्गण भरै सद्द देवी करै नद्द भैरो ररै गीत गावै ॥ ॥ भूत औ प्रेत बैताल बीरं बली मास अहार तारी बजावै ॥ ॥ जच्छ गंध्रब अउ सरब बिद्दिआधरं मद्धि आकास भयो सद्द देवं ॥ ॥ ॥ लुत्थ बिदुत्थरी हूह कूहं भरी मच्चीयं जुद्ध अनूप अतेवं ॥३८९॥ ॥ संगीत छपै छंद ॥ ॥ कागड़दी कुप्पयो कपि कटक बागड़दी बाजन रण बजिय ॥ ॥ तागड़दी तेग झलहली गागड़दी जोधा गल गजिय ॥ ॥ सागड़दी सूर समुहे नागड़दी नारद मुनि नच्चयो ॥ ॥ बागड़दी बीर बैताल आगड़दी आरण रंग रच्चयो ॥ ॥ संसागड़दी सुभट नच्चे समर फागड़दी फुंक फणीअर करैं ॥ ॥ ॥ संसागड़दी समटै सुंकड़ै फणपति फणि फिरि फिरि धरैं ॥३९०॥ ॥ फागड़दी फुंक फिंकरी रागड़दी रण गिद्ध रड़क्कै ॥ ॥ लागड़दी लुत्थ बित्थुरी भागड़दी भट घाइ भभक्कै ॥ ॥ बागड़दी बरक्खत बाण झागड़दी झलमलत क्रिपाणं ॥ ॥ गागड़दी गज्ज संजरै कागड़दी कच्छे किंकाणं ॥ ॥ ब्मबागड़दी बहत बीरन सिरन तागड़दी तमकि तेगं कड़ीअ ॥ ॥ ॥ झंझागड़दी झड़क दै झड़ समै झलमल झुकि बिजुल झड़ीअ ॥३९१॥ ॥ नागड़दी नारांतक गिरत दागड़दी देवांतक धायो ॥ ॥ जागड़दी जुद्ध करि तुमल सागड़दी सुरलोक सिधायो ॥ ॥ दागड़दी देव रहसंत आगड़दी आसुरण रण सोगं ॥ ॥ सागड़दी सिद्ध सर संत नागड़दी नाचत तजि जोगं ॥ ॥ खंखागड़दी खयाह भए प्रापति खल पागड़दी पुहप डारत अमर ॥ ॥ ॥ जंजागड़दी सकल जै जै जपै सागड़दी सुरपुरहि नार नर ॥३९२॥ ॥ रागड़दी रावणहि सुनयो सागड़दी दोऊ सुत रण जुझे ॥ ॥ बागड़दी बीर बहु गिरे आगड़दी आहवहि अरुझे ॥ ॥ लागड़दी लुत्थ बित्थुरी चागड़दी चांवंड चिंकारं ॥ ॥ नागड़दी नद्द भए गद्द कागड़दी काली किलकारं ॥ ॥ भ्मभागड़दी भयंकर जुद्ध भयो जागड़दी जूह जुग्गण जुरीअ ॥ ॥ ॥ कंकागड़दी किलक्कत कुहर कर पागड़दी पत्र स्रोणत भरीअ ॥३९३॥ ॥ ॥ इति देवांतक नरांतक बधहि धिआइ समापतम सतु ॥९॥
॥ अथ प्रहसत जुद्ध कथनं ॥ ॥ संगीत छपै छंद ॥ ॥ पागड़दी प्रहसत पठियो दागड़दी दै कै दल अनगन ॥ ॥ कागड़दी क्मप भूअ उठी बागड़दी बाजीय खुरीअन तन ॥ ॥ नागड़दी नील तिह झिणयो भागड़दी गहि भूमि पछाड़ीअ ॥ ॥ सागड़दी समर हहकार दागड़दी दानव दल भारीअ ॥ ॥ घंघागड़दी घाइ भकभक करत रागड़दी रुहिर रण रंग बहि ॥ ॥ ॥ जंजागड़दी जुयह जुग्गण जपै कागड़दी काक कर करककह ॥३९४॥ ॥ फागड़दी प्रहसत जुझंत लागड़दी लै चलयो अप्प दल ॥ ॥ भागड़दी भूमि भड़हड़ी कागड़दी क्मपी दोई जल थल ॥ ॥ नागड़दी नाद निह नद्द भागड़दी रण भेरि भयंकर ॥ ॥ सागड़दी सांग झलहलत चागड़दी चमकंत चलत सर ॥ ॥ खंखागड़दी खेति खड़ग खिमकत खहत चागड़दी चटक चिनगैं कढै ॥ ॥ ॥ ठंठागड़दी ठाट ठट्ट कर मनो ठागड़दी ठणक ठठिअर गढै ॥३९५॥ ॥ ढागड़दी ढाल उछलहि बागड़दी रण बीर बबक्कहि ॥ ॥ आगड़दी इक लै चलैं इक कहु इक उचक्कहि ॥ ॥ तागड़दी ताल त्मबूरं बागड़दी रण बीन सु बज्जै ॥ ॥ सागड़दी संख के सबद गागड़दी गैवर गल गज्जै ॥ ॥ धंधागड़दी धरणि धड़ धुकि परत चागड़दी चकत चित महि अमर ॥ ॥ ॥ प्मपागड़दी पुहप बरखा करत जागड़दी जच्छ गंध्रब बर ॥३९६॥ ॥ झागड़दी झुझ भट गिरैं मागड़दी मुख मार उचारै ॥ ॥ सागड़दी संज पंजरे घागड़दी घणीअर जणु कारै ॥ ॥ तागड़दी तीर बरखंत गागड़दी गहि गदा गरिसटं ॥ ॥ मागड़दी मंत्र मुख जपै आगड़दी अच्छर बर इसटं ॥ ॥ संसागड़दी सदा सिव सिमर कर जागड़दी जूझ जोधा मरत ॥ ॥ ॥ संसागड़दी सुभट सनमुख गिरत आगड़दी अपच्छरन कह बरत ॥३९७॥ ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ ॥ इतै उच्चरे राम लंकेस बैणं ॥ ॥ उतै देव देखै चड़ै रथ गैणं ॥ ॥ कहो एक एकं अनेकं प्रकारं ॥ ॥ ॥ मिले जुद्ध जेते समंतं लुझारं ॥३९८॥ ॥ बभीछण बाच राम सो ॥ ॥ धुंनं मंडलाकार जा को बिराजै ॥ ॥ सिरं जैत पत्रं सितं छत्र छाजै ॥ ॥ रथं बिसटतं बयाघ्र चरमं अभीतं ॥ ॥ ॥ तिसै नाथ जानो हठी इंद्र जीतं ॥३९९॥ ॥ नहै पिंग बाजी रथं जेन सोभैं ॥ ॥ महां काइ पेखे सभै देव छोभैं ॥ ॥ हरे सरब गरबं धनं पाल देवं ॥ ॥ ॥ महांकाइ नामा महांबीर जेवं ॥४००॥
॥ लगे मयूर बरणं रथं जेन बाजी ॥ ॥ बकै मार मारं तजै बाण राजी ॥ ॥ महां जुद्ध को कर महोदर बखानो ॥ ॥ ॥ तिसै जुद्ध करता बडो राम जानो ॥४०१॥ ॥ लगे मुखकं बरण बाजी रथेसं ॥ ॥ हसै पउन के गउन को चार देसं ॥ ॥ धरे बाण पाणं किधो काल रूपं ॥ ॥ ॥ तिसै राम जानो सही दईत भूपं ॥४०२॥ ॥ फिरै मोर पुच्छं ढुरै चउर चारं ॥ ॥ रड़ै कित्त बंदी अनंतं अपारं ॥ ॥ रथं सुवरण की किंकणी चार सोहै ॥ ॥ ॥ लखे देव कंनिआ महां तेज मोहै ॥४०३॥ ॥ छकै मद्ध जा की धुजा सारदूलं ॥ ॥ इहै दईत राजं दुरं द्रोह मूलं ॥ ॥ लसै क्रीट सीसं कसै चंद्र भा को ॥ ॥ ॥ रमा नाथ चीनो दसं ग्रीव ता को ॥४०४॥ ॥ दुहूं ओर बज्जे बजंत्रं अपारं ॥ ॥ मचे सूरबीरं महां ससत्र धारं ॥ ॥ करै अत्र पातं निपातंत सूरं ॥ ॥ ॥ उठे मद्ध जुद्धं कमद्धं करूरं ॥४०५॥ ॥ गिरै रुंड मुंडं भसुंडं अपारं ॥ ॥ रुले अंग भंगं समंतं लुझारं ॥ ॥ परी कूह जूहं उठे गद्द सद्दं ॥ ॥ ॥ जके सूरबीरं छके जाण मद्दं ॥४०६॥ ॥ गिरे झूम भूमं अघूमेति घायं ॥ ॥ उठे गद्द सद्दं चड़े चउप चायं ॥ ॥ जुझै बीर एकं अनेकं प्रकारं ॥ ॥ ॥ कटे अंग जंगं रटैं मार मारं ॥४०७॥ ॥ छुटै बाण पाणं उठैं गद्द सद्दं ॥ ॥ रुले झूम भूमं सु बीरं बिहद्दं ॥ ॥ नचे जंग रंगं ततत्थई ततत्थियं ॥ ॥ ॥ छुटै बान राजी फिरै छूछ हत्थियं ॥४०८॥ ॥ गिरे अंकुसं बारणं बीर खेतं ॥ ॥ नचे कंध हीणं कबंधं अचेतं ॥ ॥ भरैं खेचरी पत्र चउसठ चारी ॥ ॥ ॥ चले सरब आनंदि हुऐ मासहारी ॥४०९॥ ॥ गिरे बंकुड़े बीर बाजी सुदेसं ॥ ॥ परे पीलवानं छुटे चार केसं ॥ ॥ करै पैज वारं प्रचारंत बीरं ॥ ॥ ॥ उठै स्रोणधारं अपारं हमीरं ॥४१०॥ ॥ छुटैं चारि चित्रं बचित्रंत बाणं ॥ ॥ चले बैठ कै सूरबीरं बिमाणं ॥ ॥ गिरे बारुणं बित्थरी लुत्थ जुत्थं ॥ ॥ ॥ खुले सुरग दुआरं गए वीर अछुत्थं ॥४११॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ इह बिधि हत सैना भई रावण राम बिरुद्ध ॥ ॥ ॥ लंक बंक प्रापत भयो दससिर महा सक्रुद्ध ॥४१२॥ ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ ॥ तबै मुक्कले दूत लंकेस अप्पं ॥ ॥ मनं बच करमं सिवं जाप जप्पं ॥ ॥ सभै मंत्र हीणं समै अंत कालं ॥ ॥ ॥ भजो एक चित्तं सु कालं क्रिपालं ॥४१३॥ ॥ रथी पाइकं दंत पंती अनंतं ॥ ॥ चले प्खरे बाज राजं सु भंतं ॥ ॥ धसे नासका स्रोण मझं सु बीरं ॥ ॥ ॥ बज्जे कान्हरे डंक डउरू नफीरं ॥४१४॥
॥ बजै लाग बादं निनादंति वीरं ॥ ॥ उठै गद्द सद्दं निनद्दं नफीरं ॥ ॥ भए आकुलं बिआकलं छोरि भागिअं ॥ ॥ ॥ बली कु्मभकानं तऊ नाहि जागिअं ॥४१५॥ ॥ चले छाडि कै आस पासं निरासं ॥ ॥ भए भ्रात के जागबे ते उदासं ॥ ॥ तबै देवकंनिआ करियो गीत गानं ॥ ॥ ॥ उठयो देव दोखी गदा लीस पानं ॥४१६॥ ॥ करो लंक देसं प्रवेसंति सूरं ॥ ॥ बली बीस बाहं महां ससत्र पूरं ॥ ॥ कारै लाग मंत्रं कुमंत्रं बिचारं ॥ ॥ ॥ इतै उचरे बैन भ्रातं लुझारं ॥४१७॥ ॥ जलं गागरी सपत साहंस्र पूरं ॥ ॥ मुखं पुच्छ लयो कु्मभकानं करूरं ॥ ॥ कीयो मासहारं महा मद्दय पानं ॥ ॥ ॥ उठयो लै गदा को भरयो वीर मानं ॥४१८॥ ॥ भजी बानरी पेख सैना अपारं ॥ ॥ त्रसे जूथ पै जूथ जोधा जुझारं ॥ ॥ उठै गद्द सद्दं निनद्दंति वीरं ॥ ॥ ॥ फिरै रुंड मुंडं तनं तच्छ तीरं ॥४१९॥ ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ ॥ गिरै मुंड तुंडं भसुंडं गजानं ॥ ॥ फिरै रुंड मुंडं सु झुंडं निसानं ॥ ॥ रड़ै कंक बंकं ससंकंत जोधं ॥ ॥ ॥ उठी कूह जूहं मिले सैण क्रोधं ॥४२०॥ ॥ झिमी तेग तेजं सरोसं प्रहारं ॥ ॥ खिमी दामनी जाणु भादो मझारं ॥ ॥ हसे कंक बंकं कसे सूरवीरं ॥ ॥ ॥ ढली ढाल मालं सुभे तच्छ तीरं ॥४२१॥ ॥ बिराज छंद ॥ ॥ हक्क देबी करं ॥ ॥ सद्द भैरो ररं ॥ ॥ चावडी चिंकरं ॥ ॥ ॥ डाकणी डिंकरं ॥४२२॥ ॥ पत्र जुग्गण भरं ॥ ॥ लुत्थ बित्थुथरं ॥ ॥ समुहे संघरं ॥ ॥ ॥ हूह कूहं भरं ॥४२३॥ ॥ अच्छरी उछरं ॥ ॥ सिंधुरै सिंधरं ॥ ॥ मार मारुच्चरं ॥ ॥ ॥ बज्ज गज्जे सुरं ॥४२४॥ ॥ उझरे लुझरं ॥ ॥ झुमरे जुझरं ॥ ॥ बज्जीयं डमरं ॥ ॥ ॥ तालणो तु्मबरं ॥४२५॥ ॥ रसावल छंद ॥ ॥ परी मार मारं ॥ ॥ मंडे ससत्र धारं ॥ ॥ रटै मार मारं ॥ ॥ ॥ तुटै खग्ग धारं ॥४२६॥ ॥ उठै छिच्छ अपारं ॥ ॥ बहै स्रोण धारं ॥ ॥ हसै मासहारं ॥ ॥ ॥ पीऐ स्रोण सयारं ॥४२७॥ ॥ गिरे चउर चारं ॥ ॥ भजे एक हारं ॥ ॥ रटै एक मारं ॥ ॥ ॥ गिरे सूर सुआरं ॥४२८॥ ॥ चले एक सुआरं ॥ ॥ परे एक बारं ॥ ॥ बडो जुद्ध पारं ॥ ॥ ॥ निकारे हथयारं ॥४२९॥ ॥ करै एक वारं ॥ ॥ लसै खग्ग धारं ॥ ॥ उठै अंगिआरं ॥ ॥ ॥ लखै बयोम चारं ॥४३०॥ ॥ सु पैजं पचारं ॥ ॥ मंडे असत्र धारं ॥ ॥ करें मार मारं ॥ ॥ ॥ इके क्मप चारं ॥४३१॥ ॥ महां बीर जुट्टैं ॥ ॥ सरं संज फुट्टैं ॥ ॥ तड़ंकार छुट्टैं ॥ ॥ ॥ झड़ंकार उठ्ठैं ॥४३२॥ ॥ सरंधार बुठ्ठैं ॥ ॥ जुगं जुद्ध जुठ्ठैं ॥ ॥ रणं रोसु रुठ्ठैं ॥ ॥ ॥ इकं एक कुठ्ठैं ॥४३३॥
॥ ढली ढाल उठ्ठैं ॥ ॥ अरं फउज फुट्टैं ॥ ॥ कि नेजे पलट्टै ॥ ॥ ॥ चमतकार उठ्ठै ॥४३४॥ ॥ किते भूमि लुठ्ठैं ॥ ॥ गिरे एक उठ्ठैं ॥ ॥ रणं फेरि जुट्टैं ॥ ॥ ॥ बहे तेग तुट्टैं ॥४३५॥ ॥ मचे वीर वीरं ॥ ॥ धरे वीर चीरं ॥ ॥ करै ससत्र पातं ॥ ॥ ॥ उठै असत्र घातं ॥४३६॥ ॥ इतैं बान राजं ॥ ॥ उतै कु्मभ काजं ॥ ॥ करयो साल पातं ॥ ॥ ॥ गिरयो वीर भ्रातं ॥४३७॥ ॥ दोऊ जांघ फूटी ॥ ॥ रतं धार छूटी ॥ ॥ गिरे राम देखे ॥ ॥ ॥ बडे दुसट लेखे ॥४३८॥ ॥ करी बाण बरखं ॥ ॥ भरयो सैन हरखं ॥ ॥ हणे बाण ताणं ॥ ॥ ॥ झिणयो कु्मभकाणं ॥४३९॥ ॥ भए देव हरखं ॥ ॥ करी पुहप बरखं ॥ ॥ सुणयो लंक नाथं ॥ ॥ ॥ हणे भूम माथं ॥४४०॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामवतार कु्मभकरन बधहि धयाइ समापतम सतु ॥ ॥ अथ त्रिमुंड जुद्ध कथनं ॥ ॥ रसावल छंद ॥ ॥ पठयो तीन मुंडं ॥ ॥ चलयो सैन झुंडं ॥ ॥ क्रिती चित्र जोधी ॥ ॥ ॥ मंडे परम क्रोधी ॥४४१॥ ॥ बकैं मार मारं ॥ ॥ तजै बाण धारं ॥ ॥ हनूमंत कोपे ॥ ॥ ॥ रणं पाइ रोपे ॥४४२॥ ॥ असं छीन लीनो ॥ ॥ तिसी कंठि दीनो ॥ ॥ हनयो खसट नैणं ॥ ॥ ॥ हसे देव गैणं ॥४४३॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटक रामवतार त्रिमुंड बधह धयाइ समापतम सतु ॥ ॥ अथ महोदर मंत्री जुद्ध कथनं ॥ ॥ रसावल छंद ॥ ॥ सुणयो लंक नाथं ॥ ॥ धुणे सरब माथं ॥ ॥ करयो मद्द पाणं ॥ ॥ ॥ भरे बीर माणं ॥४४४॥ ॥ महिखुआस करखैं ॥ ॥ सरंधार बरखैं ॥ ॥ महोद्रादि वीरं ॥ ॥ ॥ हठे खग्ग धीरं ॥४४५॥ ॥ मोहणी छंद ॥ ॥ ढल हल्ल सुढल्ली ढोलाणं ॥ ॥ रण रंग अभंग कलोलाणं ॥ ॥ भरणंक सु नद्दं नाफीरं ॥ ॥ ॥ बरणंकसु बज्जे मज्जीरं ॥४४६॥ ॥ भरणंकसु भेरी घोराणं ॥ ॥ जणु सावण भादो मोराणं ॥ ॥ उच्छलीए प्रखरे पावंगं ॥ ॥ ॥ मच्चे जुझारे जोधंगं ॥४४७॥ ॥ सिंधुरीए सुंडी दंताले ॥ ॥ नच्चे प्खरीए मुच्छाले ॥ ॥ ओरड़ीए सरबं सैणायं ॥ ॥ ॥ देखंत सु देवं गैणायं ॥४४८॥ ॥ झल्लै अवझड़ीयं उझाड़ं ॥ ॥ रण उठै बैहैं बब्बाड़ं ॥ ॥ घै घुमे घायं अघायं ॥ ॥ ॥ भूअ डिग्गे अद्धो अद्धायं ॥४४९॥ ॥ रिस मंडै छंडै अउ छंडै ॥ ॥ हठि हसै कसै को अंडै ॥ ॥ रिस बाहैं गाहैं जोधाणं ॥ ॥ ॥ रण होहैं जोहैं क्रोधाणं ॥४५०॥
॥ रण गज्जै सज्जै ससत्राणं ॥ ॥ धनु करखैं बरखैं असत्राणं ॥ ॥ दल गाहै बाहै हथियारं ॥ ॥ ॥ रण रुझै लुंझै लुझारं ॥४५१॥ ॥ भट भेदे छेदे बरमायं ॥ ॥ भूअ डिग्गे चउरं चरमायं ॥ ॥ उघे जण नेजे मतवाले ॥ ॥ ॥ चल्ले जयों रावल जट्टाले ॥४५२॥ ॥ हठ्ठे तरवरीए हंकारं ॥ ॥ मंचे प्खरीए सूरारं ॥ ॥ अक्कुड़ियं वीरं ऐठाले ॥ ॥ ॥ तन सोहे पत्री पत्राले ॥४५३॥ ॥ नव नामक छंद ॥ ॥ तरभर पर सर ॥ ॥ निरखत सुर नर ॥ ॥ हर पुर पुर सुर ॥ ॥ ॥ निरखत बर नर ॥४५४॥ ॥ बरखत सर बर ॥ ॥ करखत धनु करि ॥ ॥ परहर पुर कर ॥ ॥ ॥ निरखत बर नर ॥४५५॥ ॥ सर बर धर कर ॥ ॥ परहर पुर सर ॥ ॥ परखत उर नर ॥ ॥ ॥ निसरत उर धर ॥४५६॥ ॥ उझरत जुझ कर ॥ ॥ बिझुरत जुझ नर ॥ ॥ हरखत मसहर ॥ ॥ ॥ बरखत सित सर ॥४५७॥ ॥ झुर झर कर कर ॥ ॥ डरि डरि धर हर ॥ ॥ हर बर धर कर ॥ ॥ ॥ बिहरत उठ नर ॥४५८॥ ॥ उचरत जस नर ॥ ॥ बिचरत धसि नर ॥ ॥ थरकत नर हर ॥ ॥ ॥ बरखत भुअ पर ॥४५९॥ ॥ तिलकड़ीआ छंद ॥ ॥ चटाक चोटै ॥ ॥ अटाक ओटै ॥ ॥ झड़ाक झाड़ै ॥ ॥ ॥ तड़ाक ताड़ै ॥४६०॥ ॥ फिरंत हूरं ॥ ॥ बरंत सूरं ॥ ॥ रणंत जोहं ॥ ॥ ॥ उठंत क्रोहं ॥४६१॥ ॥ भरंत पत्रं ॥ ॥ तुटंत अत्रं ॥ ॥ झड़ंत अगनं ॥ ॥ ॥ जलंत जगनं ॥४६२॥ ॥ तुटंत खोलं ॥ ॥ जुटंत टोलं ॥ ॥ खिमंत खग्गं ॥ ॥ ॥ उठंत अग्गं ॥४६३॥ ॥ चलंत बाणं ॥ ॥ रुकं दिसाणं ॥ ॥ पपात ससत्रं ॥ ॥ ॥ अघात असत्रं ॥४६४॥ ॥ खहंत खत्री ॥ ॥ भिरंत अत्री ॥ ॥ बुठंत बाणं ॥ ॥ ॥ खिवै क्रिपाणं ॥४६५॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ लुत्थ जुत्थ बित्थुर रही रावण राम बिरुद्ध ॥ ॥ ॥ हतयो महोदर देख कर हरि अरि फिरयो सु क्रुद्ध ॥४६६॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामवतार महोदर मंत्री बधहि धिआइ समापतम सतु ॥ ॥ अथ इंद्रजीत जुद्ध कथनं ॥ ॥ सिरखिंडी छंद ॥ ॥ जुट्टे वीर जुझारे धग्गां वज्जीआं ॥ ॥ बज्जे नाद करारे दलां मुसाहदा ॥ ॥ लुझे कारणयारे संघर सूरमे ॥ ॥ ॥ वुठ्ठे जाणु डरारे घणीअर कैबरी ॥४६७॥ ॥ वज्जे संगलीआले हाठां जुट्टीआं ॥ ॥ खेत बहे मुच्छाले कहर ततारचे ॥ ॥ डिग्गे वीर जुझारे हूंगां फुट्टीआं ॥ ॥ ॥ बक्के जांण मतवाले भंगां खाइ कै ॥४६८॥
॥ ओरड़ए हंकारी धग्गां वाइ कै ॥ ॥ वाहि फिरे तरवारी सूरे सूरिआं ॥ ॥ वग्गै रतु झुलारी झाड़ी कैबरी ॥ ॥ ॥ पाई धूम लुझारी रावण राम दी ॥४६९॥ ॥ चोबी धउस वजाई संघुर मच्चिआ ॥ ॥ बाहि फिरै वैराई तुरे ततारचे ॥ ॥ हूरां चित्त वधाई अ्मबर पूरिआ ॥ ॥ ॥ जोधियां देखण ताई हूले होईआं ॥४७०॥ ॥ पाधड़ी छंद ॥ ॥ इंद्रार वीर कुप्पयो कराल ॥ ॥ मुकतंत बाण गहि धनु बिसाल ॥ ॥ थरकंत लुत्थ फरकंत बाह ॥ ॥ ॥ जुझंत सूर अच्छरै उछाह ॥४७१॥ ॥ चमकंत चक्क्र सरखंत सेल ॥ ॥ जुमे जटाल जण गंग मेल ॥ ॥ संघरे सूर आघाइ घाइ ॥ ॥ ॥ बरखंत बाण चड़ चउप चाइ ॥४७२॥ ॥ समुले सूर आरुहे जंग ॥ ॥ बरखंत बाण बिख धर सुरंग ॥ ॥ नभि ह्वै अलोप सर बरख धार ॥ ॥ ॥ सभ ऊच नीच किंने सुमार ॥४७३॥ ॥ सभ ससत्र असत्र बिद्दिआ प्रबीन ॥ ॥ सर धार बरख सरदार चीन ॥ ॥ रघुराज आदि मोहे सु बीर ॥ ॥ ॥ दल सहित भूम डिग्गे अधीर ॥४७४॥ ॥ तब कही दूत रावणहि जाइ ॥ ॥ कपि कटक आजु जीतयो बनाइ ॥ ॥ सीअ भजहु आजु हुऐ कै निचीत ॥ ॥ ॥ संघरे राम रण इंद्रजीत ॥४७५॥ ॥ तब कहे बैण त्रिजटी बुलाइ ॥ ॥ रण म्रितक राम सीतहि दिखाइ ॥ ॥ लै गई नाथ जहि गिरे खेत ॥ ॥ ॥ म्रिग मार सिंघ जयो सुपत अचेत ॥४७६॥ ॥ सीअ निरख नाथ मन महि रिसान ॥ ॥ दस अउर चार बिद्दिआ निधान ॥ ॥ पड़ नाग मंत्र संघरी पास ॥ ॥ ॥ पति भ्रात जयाइ चित भयो हुलास ॥४७७॥ ॥ सीअ गई जगे अंगराइ राम ॥ ॥ दल सहित भ्रात जुत धरम धाम ॥ ॥ बज्जे सु नादि गज्जे सु बीर ॥ ॥ ॥ सज्जे हथियार भज्जे अधीर ॥४७८॥ ॥ समुले सूर सर बरख जुद्ध ॥ ॥ हन साल ताल बिक्राल क्रूद्ध ॥ ॥ तजि जुद्ध सुद्ध सुर मेघ धरण ॥ ॥ ॥ थल गयो नकु्मभला होम करण ॥४७९॥ ॥ लघ बीर तीर लंकेस आन ॥ ॥ इम कहै बैण तज भ्रात कान ॥ ॥ आइ है सत्रु इह घात हाथ ॥ ॥ ॥ इंद्रार बीर अरबर प्रमाथ ॥४८०॥ ॥ निज मास काट कर करत होम ॥ ॥ थरहरत भूमि अर चकत बयोम ॥ ॥ तह गयो राम भ्राता निसंगि ॥ ॥ ॥ कर धरे धनुख कट कसि निखंग ॥४८१॥ ॥ चिंती सु चित देवी प्रचंड ॥ ॥ अर हणयो बाण कीनो दुखंड ॥ ॥ रिप फिरे मार दुंदभ बजाइ ॥ ॥ ॥ उत भजे दईत दलपति जुझाइ ॥४८२॥ ॥ इति इंद्रजीत बधहि धिआइ समापतम सतु ॥
॥ अथ अतकाइ दईत जुद्ध कथनं ॥ ॥ संगीत पधिसटका छंद ॥ ॥ कागड़दंग कोप कै दईत राज ॥ ॥ जागड़दंग जुद्ध को सजयो साज ॥ ॥ बागड़दंग बीर बुल्ले अनंत ॥ ॥ ॥ रागड़दंग रोस रोहे दुरंत ॥४८३॥ ॥ पागड़दंग परम बाजी बुलंत ॥ ॥ चागड़दंग चत्र नट जयों कुदंत ॥ ॥ कागड़दंग क्रूर कढे हथिआर ॥ ॥ ॥ आगड़दंग आन बज्जे जुझार ॥४८४॥ ॥ रागड़दंग राम सैना सु क्रुद्ध ॥ ॥ जागड़दंग ज्वान जुझंत जुद्ध ॥ ॥ नागड़दंग निसाण नव सैन साज ॥ ॥ ॥ मागड़दंग मूड़ मकराछ गाज ॥४८५॥ ॥ आगड़दंग एक अतकाइ वीर ॥ ॥ रागड़दंग रोस कीने गहीर ॥ ॥ आगड़दंग एक हुक्के अनेक ॥ ॥ ॥ सागड़दंग सिंध बेला बिबेक ॥४८६॥ ॥ तागड़दंग तीर छुटै अपार ॥ ॥ बागड़दंग बूंद बन दल अनुचार ॥ ॥ आगड़दंग अरब टीडी प्रमान ॥ ॥ ॥ चागड़दंग चार चीटी समान ॥४८७॥ ॥ बागड़दंग बीर बाहुड़े नेख ॥ ॥ जागड़दंग जुद्ध अतकाइ देख ॥ ॥ दागड़दंग देव जै जै कहंत ॥ ॥ ॥ भागड़दंग भूप धन धन भनंत ॥४८८॥ ॥ कागड़दंग कहक काली कराल ॥ ॥ जागड़दंग जूह जुग्गण बिसाल ॥ ॥ भागड़दंग भूत भैरो अनंत ॥ ॥ ॥ सागड़दंग स्रोण पाणं करंत ॥४८९॥ ॥ डागड़दंग डउर डाकण डहक्क ॥ ॥ कागड़दंग क्रूर काकं कहक्क ॥ ॥ चागड़दंग चत्र चावडी चिकार ॥ ॥ ॥ भागड़दंग भूत डारत धमार ॥४९०॥ ॥ होहा छंद ॥ ॥ टुटे परे ॥ ॥ नवे मुरे ॥ ॥ असं धरे ॥ ॥ ॥ रिसं भरे ॥४९१॥ ॥ छुटे सरं ॥ ॥ चकियो हरं ॥ ॥ रुकी दिसं ॥ ॥ ॥ चपे किसं ॥४९२॥ ॥ छुटं सरं ॥ ॥ रिसं भरं ॥ ॥ गिरै भटं ॥ ॥ ॥ जिमं अटं ॥४९३॥ ॥ घुमे घयं ॥ ॥ भरे भयं ॥ ॥ चपे चले ॥ ॥ ॥ भटं भले ॥४९४॥ ॥ रटैं हरं ॥ ॥ रिसं जरं ॥ ॥ रुपै रणं ॥ ॥ ॥ घुमे ब्रणं ॥४९५॥ ॥ गिरैं धरं ॥ ॥ हुलैं नरं ॥ ॥ सरं तछे ॥ ॥ ॥ कछं कछे ॥४९६॥ ॥ घुमे ब्रणं ॥ ॥ भ्रमे रणं ॥ ॥ लजं फसे ॥ ॥ ॥ कटं कसे ॥४९७॥ ॥ धुके धकं ॥ ॥ टुके टकं ॥ ॥ छुटे सरं ॥ ॥ ॥ रुके दिसं ॥४९८॥ ॥ छपै छंद ॥ ॥ इक्क इक्क आरुहे इक्क इक्कन कह तक्कै ॥ ॥ इक्क इक्क लै चलै इक्क कह इक्क उचक्कै ॥ ॥ इक्क इक्क सर बरख इक्क धन करख रोस भर ॥ ॥ इक्क इक्क तरफंत इक्क भव सिंध गए तरि ॥ ॥ रणि इक्क इक्क सावंत भिड़ैं इक्क इक्क हुऐ बिझड़े ॥ ॥ ॥ नर इक्क अनिक ससत्रण भिड़े इक्क इक्क अवझड़ झड़े ॥४९९॥
॥ इक्क जूझ भट गिरैं इक्क बबकंत मद्ध रण ॥ ॥ इक्क देवपुर बसै इक्क भज चलत खाइ ब्रण ॥ ॥ इक्क जुझ उझड़े इक्क मुकतंत बान कसि ॥ ॥ इक्क अनिक ब्रण झलैं इक्क मुकतंत बान कसि ॥ ॥ रण भूम घूम सावंत मंडै दीरघु काइ लछमण प्रबल ॥ ॥ ॥ थिर रहे ब्रिछ उपवन किधो उत्तर दिस दुऐ अचल ॥५००॥ ॥ अजबा छंद ॥ ॥ जुट्टे बीरं ॥ ॥ छुट्टे तीरं ॥ ॥ ढुक्की ढालं ॥ ॥ ॥ क्रोहे कालं ॥५०१॥ ॥ ढंके ढोलं ॥ ॥ बंके बोलं ॥ ॥ कच्छे ससत्रं ॥ ॥ ॥ अच्छे असत्रं ॥५०२॥ ॥ क्रोधं गलितं ॥ ॥ बोधं दलितं ॥ ॥ गज्जै वीरं ॥ ॥ ॥ तज्जै तीरं ॥५०३॥ ॥ रत्ते नैणं ॥ ॥ मत्ते बैणं ॥ ॥ लुझै सूरं ॥ ॥ ॥ सुझै हूरं ॥५०४॥ ॥ लग्गैं तीरं ॥ ॥ भग्गैं वीरं ॥ ॥ रोसं रुझै ॥ ॥ ॥ असत्रं जुझै ॥५०५॥ ॥ झुमे सूरं ॥ ॥ घुमे हूरं ॥ ॥ चक्कैं चारं ॥ ॥ ॥ बक्कैं मारं ॥५०६॥ ॥ भिद्दे बरमं ॥ ॥ छिद्दे चरमं ॥ ॥ तुट्टै खग्गं ॥ ॥ ॥ उठ्ठै अंगं ॥५०७॥ ॥ नच्चे ताजी ॥ ॥ गज्जे गाजी ॥ ॥ डिग्गे वीरं ॥ ॥ ॥ तज्जे तीरं ॥५०८॥ ॥ झुमें सूरं ॥ ॥ घुमी हूरं ॥ ॥ कच्छे बाणं ॥ ॥ ॥ मत्ते माणं ॥५०९॥ ॥ पाधरी छंद ॥ ॥ तह भयो घोर आहव अपार ॥ ॥ रण भूमि झूमि जुझे जुझार ॥ ॥ इत राम भ्रात अतकाइ उत्त ॥ ॥ ॥ रिस जुझ उझरे राज पुत्त ॥५१०॥ ॥ तब राम भ्रात अति कीन रोस ॥ ॥ जिम परत अगन घ्रित करत जोस ॥ ॥ गहि बाण पाण तज्जे अनंत ॥ ॥ ॥ जिम जेठ सूर किरणै दुरंत ॥५११॥ ॥ ब्रण आप मद्ध बाहत अनेक ॥ ॥ बरणै न जाहि कहि एक एक ॥ ॥ उझरे वीर जुझण जुझार ॥ ॥ ॥ जै सबद देव भाखत पुकार ॥५१२॥ ॥ रिपु करयो ससत्र असत्रं बिहीन ॥ ॥ बहु ससत्र सासत्र बिद्दिआ प्रबीन ॥ ॥ हय मुकट सूत बिनु भयो गवार ॥ ॥ ॥ कछु चपे चोर जिम बल स्मभार ॥५१३॥ ॥ रिपु हणे बाण बज्ज्रव घात ॥ ॥ सम चले काल की जुआल तात ॥ ॥ तब कुपयो वीर अतकाइ ऐस ॥ ॥ ॥ जन प्रलै काल को मेघ जैस ॥५१४॥ ॥ इम करन लाग लपटैं लबार ॥ ॥ जिम जुब्बण हीण लपटाइ नार ॥ ॥ जिम दंत रहत गह स्वान ससक ॥ ॥ ॥ जिम गए बैस बल बीरज रसक ॥५१५॥ ॥ जिम दरब हीण कछु करि बपार ॥ ॥ जण ससत्र हीण रुझयो जुझार ॥ ॥ जिम रूप हीण बेसया प्रभाव ॥ ॥ ॥ जण बाज हीण रथ को चलाव ॥५१६॥ ॥ तब तमक तेग लछमण उदार ॥ ॥ तह हणयो सीस किनो दुफार ॥ ॥ तब गिरयो बीर अतिकाइ एक ॥ ॥ ॥ लख ताहि सूर भज्जे अनेक ॥५१७॥ ॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामवतार अतकाइ बधहि धिआइ समापतम सतु ॥१४॥
॥ अथ मकराछ जुद्ध कथनं ॥ ॥ पाधरी छंद ॥ ॥ तब रुकयो सैन मकराछ आन ॥ ॥ कह जाहु राम नही पैहो जान ॥ ॥ जिन हतयो तात रण मो अखंड ॥ ॥ ॥ सो लरो आन मो सों प्रचंड ॥५१८॥ ॥ इम सुणि कुबैण रामावतार ॥ ॥ गहि ससत्र असत्र कोपयो जुझार ॥ ॥ बहु ताण बाण तिह हणे अंग ॥ ॥ ॥ मकराछ मारि डारयो निसंग ॥५१९॥ ॥ जब हते बीर अर हणी सैन ॥ ॥ तब भजौ सूर हुऐ कर निचैन ॥ ॥ तब कु्मभ और अनकु्मभ आन ॥ ॥ ॥ दल रुक्कयो राम को तयाग कान ॥५२०॥ ॥ इति मराछ बधह ॥ ॥ अजबा छंद ॥ ॥ त्रप्पे ताजी ॥ ॥ गज्जे गाजी ॥ ॥ सज्जे ससत्रं ॥ ॥ ॥ कच्छे असत्रं ॥५२१॥ ॥ तुट्टे त्राणं ॥ ॥ छुट्टे बाणं ॥ ॥ रुप्पे बीरं ॥ ॥ ॥ बुठ्ठे तीरं ॥५२२॥ ॥ घुमे घायं ॥ ॥ जुमे चायं ॥ ॥ रज्जे रोसं ॥ ॥ ॥ तज्जे होसं ॥५२३॥ ॥ कज्जे संजं ॥ ॥ पूरे पंजं ॥ ॥ जुझे खेतं ॥ ॥ ॥ डिग्गे चेतं ॥५२४॥ ॥ घेरी लंकं ॥ ॥ बीरं बंकं ॥ ॥ भज्जी सैणं ॥ ॥ ॥ लज्जी नैणं ॥५२५॥ ॥ डिग्गे सूरं ॥ ॥ भिग्गे नूरं ॥ ॥ बयाहैं हूरं ॥ ॥ ॥ कामं पूरं ॥५२६॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामवतार मकराछ कु्मभ अनकु्मभ बधहि धयाइ समापतम सतु ॥ ॥ अथ रावन जुद्ध कथनं ॥ ॥ होहा छंद ॥ ॥ सुणयो इसं ॥ ॥ जिणयो किसं ॥ ॥ चप्पयो चित्तं ॥ ॥ ॥ बुल्लयो बित्तं ॥५२७॥ ॥ घिरियो गड़ं ॥ ॥ रिसं बड़ं ॥ ॥ भजी त्रियं ॥ ॥ ॥ भ्रमी भयं ॥५२८॥ ॥ भ्रमी तबै ॥ ॥ भजी सभै ॥ ॥ त्रियं इसं ॥ ॥ ॥ गहयो किसं ॥५२९॥ ॥ करैं हहं ॥ ॥ अहो दयं ॥ ॥ करो गई ॥ ॥ ॥ छमो भई ॥५३०॥ ॥ सुणी स्रुत्तं ॥ ॥ धुणं उतं ॥ ॥ उठयो हठी ॥ ॥ ॥ जिमं भठी ॥५३१॥ ॥ कछयो नरं ॥ ॥ तजे सरं ॥ ॥ हणे किसं ॥ ॥ ॥ रुकी दिसं ॥५३२॥ ॥ त्रिणणिण छंद ॥ ॥ त्रिणणिण तीरं ॥ ॥ ब्रिणणिण बीरं ॥ ॥ ढ्रणणण ढालं ॥ ॥ ॥ ज्रणणण ज्वालं ॥५३३॥ ॥ ख्रणणण खोलं ॥ ॥ ब्रणणण बोलं ॥ ॥ क्रणणण रोसं ॥ ॥ ॥ ज्रणणण जोसं ॥५३४॥ ॥ ब्रणणण बाजी ॥ ॥ त्रिणणण ताजी ॥ ॥ ज्रणणण जूझे ॥ ॥ ॥ ल्रणणण लूझे ॥५३५॥ ॥ हरणण हाथी ॥ ॥ सरणण साथी ॥ ॥ भरणण भाजे ॥ ॥ ॥ लरणण लाजे ॥५३६॥ ॥ चरणण चरमं ॥ ॥ बरणण बरमं ॥ ॥ करणण काटे ॥ ॥ ॥ बरणण बाटे ॥५३७॥ ॥ मरणण मारे ॥ ॥ तरणण तारे ॥ ॥ जरणण जीता ॥ ॥ ॥ सरणण सीता ॥५३८॥ ॥ गरणण गैणं ॥ ॥ अरणण ऐणं ॥ ॥ हरणण हूरं ॥ ॥ ॥ परणण पूरं ॥५३९॥
॥ बरणण बाजे ॥ ॥ गरणण गाजे ॥ ॥ सरणण सुझे ॥ ॥ ॥ जरणण जुझे ॥५४०॥ ॥ त्रिगता छंद ॥ ॥ तत्त तीरं ॥ ॥ बब्ब बीरं ॥ ॥ ढल्ल ढालं ॥ ॥ ॥ जज्ज जुआलं ॥५४१॥ ॥ तज्ज ताजी ॥ ॥ गग्ग गाजी ॥ ॥ मम मारे ॥ ॥ ॥ तत्त तारे ॥५४२॥ ॥ जज्ज जीते ॥ ॥ लल्ल लीते ॥ ॥ तत्त तोरे ॥ ॥ ॥ छच्छ छोरे ॥५४३॥ ॥ रर राजं ॥ ॥ गग्ग गाजं ॥ ॥ धद्ध धायं ॥ ॥ ॥ चच्च चायं ॥५४४॥ ॥ डड डिग्गे ॥ ॥ भभ भिग्गे ॥ ॥ सस स्रोणं ॥ ॥ ॥ तत्त तोणं ॥५४५॥ ॥ सस साधैं ॥ ॥ बब्ब बाधैं ॥ ॥ अअ अंगं ॥ ॥ ॥ जज जंगं ॥५४६॥ ॥ कक्क क्रोधं ॥ ॥ जज जोधं ॥ ॥ घघ घाए ॥ ॥ ॥ धद्ध धाए ॥५४७॥ ॥ हह हूरं ॥ ॥ पप्प पूरं ॥ ॥ गग्ग गैणं ॥ ॥ ॥ अअ ऐणं ॥५४८॥ ॥ बब्ब बाणं ॥ ॥ तत्त ताणं ॥ ॥ छच्छ छोरैं ॥ ॥ ॥ जज जोरैं ॥५४९॥ ॥ बब्ब बाजे ॥ ॥ गग्ग गाजे ॥ ॥ भभ भूमं ॥ ॥ ॥ झझ झूमं ॥५५०॥ ॥ अनाद छंद ॥ ॥ चल्ले बाण रुक्के गैण ॥ ॥ मत्ते सूर रत्ते नैण ॥ ॥ ढक्के ढोल ढुक्की ढाल ॥ ॥ ॥ छुट्टै बान उठ्ठै ज्वाल ॥५५१॥ ॥ भिग्गे स्रोण डिग्गे सूर ॥ ॥ झुमे भूम घुमी हूर ॥ ॥ बज्जे संख सद्दं गद्द ॥ ॥ ॥ तालं संख भेरी नद्द ॥५५२॥ ॥ तुट्टे त्रण फुट्टे अंग ॥ ॥ जुझे वीर रुझे जंग ॥ ॥ मच्चे सूर नच्ची हूर ॥ ॥ ॥ मत्ती धुम भूमी पूर ॥५५३॥ ॥ उठ्ठे अद्ध बद्ध कमद्ध ॥ ॥ प्खर राग खोल सनद्ध ॥ ॥ छक्के छोभ छुट्टे केस ॥ ॥ ॥ संघर सूर सिंघन भेस ॥५५४॥ ॥ टुट्टर टीक टुट्टे टोप ॥ ॥ भग्गे भूप भंनी धोप ॥ ॥ घुमे घाइ झूमी भूम ॥ ॥ ॥ अउझड़ झाड़ धूमं धूम ॥५५५॥ ॥ बज्जे नाद बाद अपार ॥ ॥ सज्जे सूर वीर जुझार ॥ ॥ जुझे टूक टूक ह्वै खेत ॥ ॥ ॥ मत्ते मद्द जाण अचेत ॥५५६॥ ॥ छुट्टे ससत्र असत्र अनंत ॥ ॥ रंगे रंग भूम दुरंत ॥ ॥ खुल्ले अंध धुंध हथिआर ॥ ॥ ॥ बक्के सूर वीर बिक्रार ॥५५७॥ ॥ बिथुरी लुत्थ जुत्थ अनेक ॥ ॥ मच्चे कोटि भग्गे एक ॥ ॥ हसे भूत प्रेत मसाण ॥ ॥ ॥ लुझे जुझ रुझ क्रिपाण ॥५५८॥ ॥ बहड़ा छंद ॥ ॥ अधिक रोस कर राज पखरीआ धावही ॥ ॥ राम राम बिनु संक पुकारत आवही ॥ ॥ रुझ जुझ झड़ पड़त भयानक भूम पर ॥ ॥ ॥ रामचंद्र के हाथ गए भवसिंध तर ॥५५९॥ ॥ सिमट सांग संग्रहै समुह हुऐ जूझही ॥ ॥ टूक टूक हुऐ गिरत न घर कह बूझही ॥ ॥ खंड खंड हुऐ गिरत खंड धन खंड रन ॥ ॥ ॥ तनक तनक लग जांहि असन की धार तन ॥५६०॥
॥ संगीत बहड़ा छंद ॥ ॥ सागड़दी सांग संग्रहै तागड़दी रण तुरी नचावहि ॥ ॥ झागड़दी झूम गिर भूमि सागड़दी सुरपुरहि सिधावहि ॥ ॥ आगड़दी अंग हुऐ भंग आगड़दी आहव महि डिगही ॥ ॥ ॥ हो बागड़दी वीर बिक्रार सागड़दी स्रोणत तन भिगही ॥५६१॥ ॥ रागड़दी रोस रिप राज लागड़दी लछमण पै धायो ॥ ॥ कागड़दी क्रोध तन कुड़यो पागड़दी हुऐ पवन सिधायो ॥ ॥ आगड़दी अनुज उर तात घागड़दी गहि घाइ प्रहारयो ॥ ॥ ॥ झागड़दी झूमि भूअ गिरयो सागड़दी सुत बैर उतारयो ॥५६२॥ ॥ चागड़दी चिंक चांवडी डागड़दी डाकण डक्कारी ॥ ॥ भागड़दी भूत भर हरे रागड़दी रण रोस प्रजारी ॥ ॥ मागड़दी मूरछा भयो लागड़दी लछमण रण जुझयो ॥ ॥ ॥ जागड़दी जाण जुझि गयो रागड़दी रघुपत इम बुझयो ॥५६३॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामवतार लछमन मूरछना भवेत धिआइ समापतम सतु ॥ ॥ संगीत बहड़ा छंद ॥ ॥ कागड़दी कटक कपि भजयो लागड़दी लछमण जुझयो जब ॥ ॥ रागड़दी राम रिस भरयो सागड़दी गहि असत्र ससत्र सभ ॥ ॥ धागड़दी धउल धड़ हड़यो कागड़दी कोड़्मभ कड़क्कयो ॥ ॥ ॥ भागड़दी भूमि भड़हड़ी पागड़दी जन पलै पलट्टयो ॥५६४॥ ॥ अरध नराज छंद ॥ ॥ कढी सु तेग दुद्धरं ॥ ॥ अनूप रूप सुभरं ॥ ॥ भकार भेर भै करं ॥ ॥ ॥ बकार बंदणो बरं ॥५६५॥ ॥ बचित्र चित्रतं सरं ॥ ॥ तजंत तीखणो नरं ॥ ॥ परंत जूझतं भटं ॥ ॥ ॥ जणंकि सावणं घटं ॥५६६॥ ॥ घुमंत अघ ओघयं ॥ ॥ बदंत बकत्र तेजयं ॥ ॥ चलंत तयागते तनं ॥ ॥ ॥ भणंत देवता धनं ॥५६७॥ ॥ छुटंत तीर तीखणं ॥ ॥ बजंत भेर भीखणं ॥ ॥ उठंत गद्द सद्दणं ॥ ॥ ॥ मसत्त जाण मद्दणं ॥५६८॥ ॥ करंत चाचरो चरं ॥ ॥ नचंत निरतणो हरं ॥ ॥ पुअंत पारबती सिरं ॥ ॥ ॥ हसंत प्रेतणी फिरं ॥५६९॥ ॥ अनूप निराज छंद ॥ ॥ डकंत डाकणी डुलं ॥ ॥ भ्रमंत बाज कुंडलं ॥ ॥ रड़ंत बंदिणो क्रितं ॥ ॥ ॥ बदंत मागयो जयं ॥५७०॥ ॥ ढलंत ढाल उढलं ॥ ॥ खिमंत तेग निरमलं ॥ ॥ चलंत राजवं सरं ॥ ॥ ॥ पपात उरवीअं नरं ॥५७१॥ ॥ भजंत आसुरी सुतं ॥ ॥ किलंक बानरी पुतं ॥ ॥ बजंत तीर तुप्पकं ॥ ॥ ॥ उठंत दारुणो सुरं ॥५७२॥ ॥ भभक्क भूत भै करं ॥ ॥ चचक्क चउदणो चकं ॥ ॥ ततक्ख प्खरं तुरे ॥ ॥ ॥ बजे निनद्द सिंधुरे ॥५७३॥
॥ उठंत भै करी सरं ॥ ॥ मचंत जोधणे जुधं ॥ ॥ खिमंत उजलीअसं ॥ ॥ ॥ बबरख तीखणो सरं ॥५७४॥ ॥ संगीत भुजंग प्रयात छंद ॥ ॥ जागड़दंग जुझयो भागड़दंग भ्रातं ॥ ॥ रागड़दंग रामं तागड़दंग तातं ॥ ॥ बागड़दंग बाणं छागड़दंग छोरे ॥ ॥ ॥ आगड़दंग आकास ते जान ओरे ॥५७५॥ ॥ बागड़दंग बाजी रथी बाण काटे ॥ ॥ गागड़दंग गाजी गजी वीर डाटे ॥ ॥ मागड़दंग मारे सागड़दंग सूरं ॥ ॥ ॥ बागड़दंग बयाहैं हागड़दंग हूरं ॥५७६॥ ॥ जागड़दंग जीता खागड़दंग खेतं ॥ ॥ भागड़दंग भागे कागड़दंग केतं ॥ ॥ सागड़दंग सूरानु जुंआन पेखा ॥ ॥ ॥ पागड़दंग प्रानान ते प्रान लेखा ॥५७७॥ ॥ चागड़दंग चिंतं पागड़दंग प्राजी ॥ ॥ सागड़दंग सैना लागड़दंग लाजी ॥ ॥ सागड़दंग सुग्रीव ते आदि लै कै ॥ ॥ ॥ कागड़दंग कोपे तागड़दंग तै कै ॥५७८॥ ॥ हागड़दंग हनू कागड़दंग कोपा ॥ ॥ बागड़दंग बीरा नमो पाव रोपा ॥ ॥ सागड़दंग सूरं हागड़दंग हारे ॥ ॥ ॥ तागड़दंग तै कै हनू तउ पुकारे ॥५७९॥ ॥ सागड़दंग सुनहो रागड़दंग रामं ॥ ॥ दागड़दंग दीजे पागड़दंग पानं ॥ ॥ पागड़दंग पीठं ठागड़दंग ठोको ॥ ॥ ॥ हरो आज पानं सुरं मोह लोको ॥५८०॥ ॥ आगड़दंग ऐसे कहयो अउ उडानो ॥ ॥ गागड़दंग गैनं मिलयो मद्ध मानो ॥ ॥ रागड़दंग रामं आगड़दंग आसं ॥ ॥ ॥ बागड़दंग बैठे नागड़दंग निरासं ॥५८१॥ ॥ आगड़दंग आगे कागड़दंग कोऊ ॥ ॥ मागड़दंग मारे सागड़दंग सोऊ ॥ ॥ नागड़दंग नाकी तागड़दंग तालं ॥ ॥ ॥ मागड़दंग मारे बागड़दंग बिसालं ॥५८२॥ ॥ आगड़दंग एकं दागड़दंग दानो ॥ ॥ चागड़दंग चीरा दागड़दंग दुरानो ॥ ॥ दागड़दंग दोखी बागड़दंग बूटी ॥ ॥ ॥ आगड़दंग है एक ते एक जूटी ॥५८३॥ ॥ चागड़दंग चउका हागड़दंग हनवंता ॥ ॥ जागड़दंग जोधा महां तेज मंता ॥ ॥ आगड़दंग उखारा पागड़दंग पहारं ॥ ॥ ॥ आगड़दंग लै अउखधी को सिधारं ॥५८४॥ ॥ आगड़दंग आए जहा राम खेतं ॥ ॥ बागड़दंग बीरं जहां ते अचेतं ॥ ॥ बागड़दंग बिसल्लया मागड़दंग मुक्खं ॥ ॥ ॥ डागड़दंग डारी सागड़दंग सुक्खं ॥५८५॥ ॥ जागड़दंग जागे सागड़दंग सूरं ॥ ॥ घागड़दंग घुमी हागड़दंग हूरं ॥ ॥ छागड़दंग छूटे नागड़दंग नादं ॥ ॥ ॥ बागड़दंग बाजे नागड़दंग नादं ॥५८६॥
॥ तागड़दंग तीरं छागड़दंग छूटे ॥ ॥ गागड़दंग गाजी जागड़दंग जुटे ॥ ॥ खागड़दंग खेतं सागड़दंग सोए ॥ ॥ ॥ पागड़दंग ते पाक साहीद होए ॥५८७॥ ॥ कलस ॥ ॥ मच्चे सूरबीर बिक्रारं ॥ ॥ नच्चे भूत प्रेत बैतारं ॥ ॥ झमझम लसत कोटि करवारं ॥ ॥ ॥ झलहलंत उज्जल असि धारं ॥५८८॥ ॥ त्रिभंगी छंद ॥ ॥ उज्जल अस धारं लसत अपारं करण लुझारं छबि धारं ॥ ॥ सोभित जिमु आरं अत छबि धारं सु बध सुधारं अर गारं ॥ ॥ जैपत्रं दाती मदिणं माती स्रोणं राती जै करणं ॥ ॥ ॥ दुज्जन दल हंती अछल जयंती किलविख हंती भै हरणं ॥५८९॥ ॥ कलस ॥ ॥ भरहरंत भज्जत रण सूरं ॥ ॥ थरहर करत लोह तन पूरं ॥ ॥ तड़भड़ बजैं तबल अरु तूरं ॥ ॥ ॥ घुमी पेख सुभट रन हूरं ॥५९०॥ ॥ त्रिभंगी छंद ॥ ॥ घुमी रण हूरं नभ झड़ पूरं लख लख सूरं मन मोही ॥ ॥ आरुण तन बाणं छब अप्रमाणं अतिदुत खाणं तन सोही ॥ ॥ काछनी सुरंगं छबि अंग अंगं लजत अनंगं लख रूपं ॥ ॥ ॥ साइक द्रिग हरणी कुमत प्रजरणी बरबर बरणी बुध कूपं ॥५९१॥ ॥ कलस ॥ ॥ कमल बदन साइक म्रिग नैणी ॥ ॥ रूप रास सुंदर पिक बैणी ॥ ॥ म्रिगपत कट छाजत गज गैणी ॥ ॥ ॥ नैन कटाछ मनहि हर लैणी ॥५९२॥ ॥ त्रिभंगी छंद ॥ ॥ सुंदर म्रिग नैणी सुर पिक बैणी चित हर लैणी गज गैणं ॥ ॥ माधुर बिधि बदनी सुबुद्धिन सदनी कुमतिन कदनी छबि मैणं ॥ ॥ अंगका सुरंगी नटवर रंगी झांझ उतंगी पग धारं ॥ ॥ ॥ बेसर गजरारं पहूच अपारं कचि घुंघरारं आहारं ॥५९३॥ ॥ कलस ॥ ॥ चिबक चार सुंदर छबि धारं ॥ ॥ ठउर ठउर मुकतन के हारं ॥ ॥ कर कंगन पहुची उजिआरं ॥ ॥ ॥ निरख मदन दुत होत सु मारं ॥५९४॥ ॥ त्रिभंगी छंद ॥ ॥ सोभित छबि धारं कच घुंघरारं रसन रसारं उजिआरं ॥ ॥ पहुंची गजरारं सुबिध सुधारं मुकत निहारं उर धारं ॥ ॥ सोहत चख चारं रंग रंगारं बिबिध प्रकारं अति आंजे ॥ ॥ ॥ बिख धर म्रिग जैसे जल जन वैसे ससीअर जैसे सर मांजे ॥५९५॥ ॥ कलस ॥ ॥ भयो मूड़ रावण रण क्रुद्धं ॥ ॥ मच्चिओ आन तुमल्ल जब जुद्धं ॥ ॥ जूझे सकल सूरमां सुद्धं ॥ ॥ ॥ अर दल मद्धि सबद कर उद्धं ॥५९६॥
॥ त्रिभंगी छंद ॥ ॥ धायो कर क्रुद्धं सुभट बिरुद्धं गलित सुबुद्धं गहि बाणं ॥ ॥ कीनो रण सुद्धं नचत कबुद्धं अत धुन उद्धं धनु ताणं ॥ ॥ धाए रजवारे दुद्धर हकारे सु ब्रण प्रहारे कर कोपं ॥ ॥ ॥ घाइन तन रज्जे दु पग न भज्जे जनु हर गज्जे पग रोपं ॥५९७॥ ॥ कलस ॥ ॥ अधिक रोस सावत रन जूटे ॥ ॥ बखतर टोप जिरै सभ फूटे ॥ ॥ निसर चले साइक जन छूटे ॥ ॥ ॥ जनिक सिचान मास लख टूटे ॥४९८॥ ॥ त्रिभंगी छंद ॥ ॥ साइक जणु छूटे तिम अरि जूटे बखतर फूटे जेब जिरे ॥ ॥ मसहर भुखिआए तिमु अरि धाए ससत्र नचाइन फेरि फिरें ॥ ॥ सनमुखि रण गाजैं किमहूं न भाजैं लख सुर लाजैं रण रंगं ॥ ॥ ॥ जै जै धुन करही पुहपन डरही सु बिधि उचरही जै जंगं ॥५९९॥ ॥ कलस ॥ ॥ मुख त्मबोर अरु रंग सुरंगं ॥ ॥ निडर भ्रमंत भूमि उह जंगं ॥ ॥ लिपत मलै घनसार सुरंगं ॥ ॥ ॥ रूप भान गतिवान उतंगं ॥६००॥ ॥ त्रिभंगी छंद ॥ ॥ तन सुभत सुरंगं छबि अंग अंगं लजत अनंगं लख नैणं ॥ ॥ सोभित कचकारे अत घुंघरारे रसन रसारे म्रिद बैणं ॥ ॥ मुखि छकत सुबासं दिनस प्रकासं जनु सस भासं तस सोभं ॥ ॥ ॥ रीझत चख चारं सुरपुर पयारं देव दिवारं लखि लोभं ॥६०१॥ ॥ कलस ॥ ॥ चंद्रहास एकं कर धारी ॥ ॥ दुतीआ धोपु गहि त्रिती कटारी ॥ ॥ चत्रथ हाथ सैहथी उजिआरी ॥ ॥ ॥ गोफन गुरज करत चमकारी ॥६०२॥ ॥ त्रिभंगी छंद ॥ ॥ सतए अस भारी गदहि उभारी त्रिसूल सुधारी छुरकारी ॥ ॥ ज्मबूवा अर बानं सु कसि कमानं चरम अप्रमानं धर भारी ॥ ॥ पंद्रए गलोलं पास अमोलं परस अडोलं हथि नालं ॥ ॥ ॥ बिछूआ पहरायं पटा भ्रमायं जिम जम धायं बिकरालं ॥६०३॥ ॥ कलस ॥ ॥ सिव सिव सिव मुख एक उचारं ॥ ॥ दुतीअ प्रभा जानकी निहारं ॥ ॥ त्रितीअ झुंड सभ सुभट पचारं ॥ ॥ ॥ चत्रथ करत मार ही मारं ॥६०४॥ ॥ त्रिभंगी छंद ॥ ॥ पचए हनवंतं लख दुत मंतं सु बल दुरंतं तजि कलिणं ॥ ॥ छठए लखि भ्रातं तकत पपातं लगत न घातं जीअ जलिणं ॥ ॥ सतए लखि रघुपति कप दल अधपति सुभट बिकट मत जुत भ्रातं ॥ ॥ ॥ अठिओ सिरि ढोरैं नवमि निहोरैं दसयन बोरैं रिस रातं ॥६०५॥
॥ चौबोला छंद ॥ ॥ धाए महां बीर साधे सितं तीर काछे रणं चीर बाना सुहाए ॥ ॥ रवां करद मरकब यलो तेज इम सभ चूं तुंद अजद होओ मिआ जंगाहे ॥ ॥ भिड़े आइ ईहा बुले बैण कीहां करें घाइ जीहां भिड़े भेड़ भज्जे ॥ ॥ ॥ पीयो पोसताने भछो राबड़ीने कहां छैअणी रोधणीने निहारैं ॥६०६॥ ॥ गाजे महा सूर घुमी रणं हूर भरमी नभं पूर बेखं अनूपं ॥ ॥ वले वल्ल साई जीवी जुगां ताई तैंडे घोली जाई अलावीत ऐसे ॥ ॥ लगो लार थाने बरो राज माने कहो अउर काने हठी छाड थेसो ॥ ॥ ॥ बरो आन मो को भजो आन तो को चलो देव लोको तजो बेग लंका ॥६०७॥ ॥ स्वैया ॥ ॥ अनंततुका ॥ ॥ रोस भरयो तज होस निसाचर स्री रघुराज को घाइ प्रहारे ॥ ॥ जोस बडो कर कउसलिसं अध बीच ही ते सर काट उतारे ॥ ॥ फेर बडो कर रोस दिवारदन धाइ परैं कपि पुंज संघारै ॥ ॥ ॥ पट्टस लोह हथी पर संगड़ीए ज्मबुवे जमदाड़ चलावै ॥६०८॥ ॥ चौबोला स्वैया ॥ ॥ स्री रघुराज सरासन लै रिस ठाट घनी रन बान प्रहारे ॥ ॥ बीरन मार दुसार गए सर अ्मबर ते बरसे जन ओरे ॥ ॥ बाज गजी रथ साज गिरे धर पत्र अनेक सु कउन गनावै ॥ ॥ ॥ फागन पउन प्रचंड बहे बन पत्रन ते जन पत्र उडाने ॥६०९॥ ॥ स्वैया छंद ॥ ॥ रोस भरयो रन मौ रघुनाथ सु रावन को बहु बान प्रहारे ॥ ॥ स्रोणन नैक लगयो तिन के तन फोर जिरै तन पार पधारे ॥ ॥ बाज गजी रथ राज रथी रण भूमि गिरे इह भांति संघारे ॥ ॥ ॥ जानो बसंत के अंत समै कदली दल पउन प्रचंड उखारे ॥६१०॥ ॥ धाइ परे कर कोप बनेचर है तिन के जीअ रोस जगयो ॥ ॥ किलकार पुकार परे चहूं घारण छाडि हठी नहि एक भगयो ॥ ॥ गहि बान कमान गदा बरछी उत ते दल रावन को उमगयो ॥ ॥ ॥ भट जूझि अरूझि गिरे धरणी दिजराज भ्रमयो सिव धयान डिगयो ॥६११॥ ॥ जूझि अरूझि गिरे भटवा तन घाइन घाइ घने भिभराने ॥ ॥ ज्मबुक गिद्ध पिसाच निसाचर फूल फिरे रन मौ रहसाने ॥ ॥ कांप उठी सु दिसा बिदिसा दिगपालन फेर प्रलै अनुमाने ॥ ॥ ॥ भूमि अकास उदास भए गन देव अदेव भ्रमे भहराने ॥६१२॥
॥ रावन रोस भरयो रन मो रिस सौ सर ओघ प्रओघ प्रहारे ॥ ॥ भूमि अकास दिसा बिदिसा सभ ओर रुके नहि जात निहारे ॥ ॥ स्री रघुराज सरासन लै छिन मौ छुभ कै सर पुंज निवारे ॥ ॥ ॥ जानक भान उदै निस कउ लखि कै सभ ही तप तेज पधारे ॥६१३॥ ॥ रोस भरे रन मो रघुनाथ कमान लै बान अनेक चलाए ॥ ॥ बाज गजी गजराज घने रथ राज बने करि रोस उडाए ॥ ॥ जे दुख देह कटे सीअ के हित ते रन आज प्रतक्ख दिखाए ॥ ॥ ॥ राजीव लोचन राम कुमार घनो रन घाल घनो घर घाए ॥६१४॥ ॥ रावन रोस भरयो गरजयो रन मो लहि कै सभ सैन भजानयो ॥ ॥ आप ही हाक हथियार हठी गहि स्री रघुनंदन सो रण ठानयो ॥ ॥ चाबक मार कुदाइ तुरंगन जाइ परयो कछु त्रास न मानयो ॥ ॥ ॥ बानन ते बिधु बाहन ते मन मारत को रथ छोरि सिधानयो ॥६१५॥ ॥ स्री रघुनंदन की भुज के जब छोर सरासन बान उडाने ॥ ॥ भूमि अकास पतार चहूं चक पूर रहे नही जात पछाने ॥ ॥ तोर सनाह सुबाहन के तन आह करी नही पार पराने ॥ ॥ ॥ छोद करोटन ओटन कोट अटानमो जानकी बान पछाने ॥६१६॥ ॥ स्री असुरारदन के कर को जिन एक ही बान बिखै तन चाखयो ॥ ॥ भाज सरयो न भिरयो हठ कै भट एक ही घाइ धरा पर राखयो ॥ ॥ छेद सनाह सुबाहन को सर ओटन कोट करोटन नाखयो ॥ ॥ ॥ सुआर जुझार अपार हठी रन हार गिरे धर हाइ न भाखयो ॥६१७॥ ॥ आन अरे सु मरे सभ ही भट जीत बचे रन छाडि पराने ॥ ॥ देव अदेवन के जितीया रन कोट हते कर एक न जाने ॥ ॥ स्री रघुराज प्राक्रम को लख तेज स्मबूह सभै भहराने ॥ ॥ ॥ ओटन कूद करोटन फांध सु लंकहि छाडि बिलंक सिधाने ॥६१८॥ ॥ रावन रोस भरयो रन मो गहि बीस हूं बाहि हथयार प्रहारे ॥ ॥ भूमि अकास दिसा बिदिसा चकि चार रुके नही जात निहारे ॥ ॥ फोकन तै फल तै मद्ध तै अध तै बध कै रण मंडल डारे ॥ ॥ ॥ छंत्र धुजा बर बाज रथी रथ काटि सभै रघुराज उतारे ॥६१९॥ ॥ रावन चउप चलयो चप कै निज बाज बिहीन जबै रथ जानयो ॥ ॥ ढाल त्रिसूल गदा बरछी गहि स्री रघुनंदन सो रन ठानयो ॥ ॥ धाइ परयो ललकार हठी कप पुंजन को कछु त्रास न मानयो ॥ ॥ ॥ अंगद आदि हनवंत ते लै भट कोट हुते कर एक न जानयो ॥६२०॥
॥ रावन को रघुराज जबै रण मंडल आवत मद्धि निहारयो ॥ ॥ बीस सिला सित साइक लै करि कोपु बडो उर मद्ध प्रहारयो ॥ ॥ भेद चले मरम सत्थल को सर स्रोण नदी सर बीच पखारयो ॥ ॥ ॥ आगे ही रेंग चलयो हठि कै भट धाम को भूल न नाम उचारयो ॥६२१॥ ॥ रोस भरयो रन मौ रघुनाथ सु पान के बीच सरासन लै कै ॥ ॥ पांचक पाइ हटाइ दयो तिह बीसहूं बांहि बिना ओह कै कै ॥ ॥ दै दस बान बिमान दसो सिर काट दए सिव लोक पठै कै ॥ ॥ ॥ स्री रघुराज बरयो सीअ को बहुरो जनु जुद्ध सुय्मबर जै कै ॥६२२॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामवतार दस सिर बधह धिआइ समापतम सतु ॥ ॥ अथ मदोदरी समोध बभीछन को लंक राज दीबो ॥ ॥ सीता मिलबो कथनं ॥ ॥ स्वैया छंद ॥ ॥ इंद्र डराकुल थो जिह के डर सूरज चंद्र हुतो भय भीतो ॥ ॥ लूट लयो धन जउन धनेस को ब्रहम हुतो चित मोननि चीतो ॥ ॥ इंद्र से भूप अनेक लरै इन सौ फिरि कै ग्रह जात न जीतो ॥ ॥ ॥ सो रन आज भलैं रघुराज सु जुद्ध सुय्मबर कै सीअ जीतो ॥६२३॥ ॥ अलका छंद ॥ ॥ चटपट सैणं खटपट भाजे ॥ ॥ झटपट जुझयो लख रण राजे ॥ ॥ सटपट भाजे अटपट सूरं ॥ ॥ ॥ झटपट बिसरी घट पट हूरं ॥६२४॥ ॥ चटपट पैठे खटपट लंकं ॥ ॥ रण तज सूरं सर धर बंकं ॥ ॥ झलहल बारं नरबर नैणं ॥ ॥ ॥ धकि धकि उचरे भकि भकि बैणं ॥६२५॥ ॥ नर बर रामं बरनर मारो ॥ ॥ झटपट बाहं कटि कटि डारो ॥ ॥ तब सभ भाजे रख रख प्राणं ॥ ॥ ॥ खटपट मारे झटपट बाणं ॥६२६॥ ॥ चटपट रानी सटपट धाई ॥ ॥ रटपट रोवत अटपट आई ॥ ॥ चटपट लागी अटपट पायं ॥ ॥ ॥ नरबर निरखे रघुबर रायं ॥६२७॥ ॥ चटपट लोटैं अटपट धरणी ॥ ॥ कसि कसि रोवैं बरनर बरणी ॥ ॥ पटपट डारैं अटपट केसं ॥ ॥ ॥ बट हरि कूकैं नट वर भेसं ॥६२८॥ ॥ चटपट चीरं अटपट पारैं ॥ ॥ धर कर धूमं सरबर डारैं ॥ ॥ सटपट लोटैं खटपट भूमं ॥ ॥ ॥ झटपट झूरैं घरहर घूमं ॥६२९॥ ॥ रसावल छंद ॥ ॥ जबै राम देखै ॥ ॥ महा रूप लेखै ॥ ॥ रही नयाइ सीसं ॥ ॥ ॥ सभै नार ईसं ॥६३०॥ ॥ लखैं रूप मोही ॥ ॥ फिरी राम देही ॥ ॥ दई ताहि लंका ॥ ॥ ॥ जिमं राज टंका ॥६३१॥
॥ क्रिपा द्रिसट भीने ॥ ॥ तरे नेत्र कीने ॥ ॥ झरै बार ऐसे ॥ ॥ ॥ महा मेघ जैसे ॥६३२॥ ॥ छकी पेख नारी ॥ ॥ सरं काम मारी ॥ ॥ बिधी रूप रामं ॥ ॥ ॥ महां धरम धामं ॥६३३॥ ॥ तजी नाथ प्रीतं ॥ ॥ चुभे राम चीतं ॥ ॥ रही जोर नैणं ॥ ॥ ॥ कहैं मद्द बैणं ॥६३४॥ ॥ सीआ नाथ नीके ॥ ॥ हरैं हार जीके ॥ ॥ लए जात चित्तं ॥ ॥ ॥ मनो चोर बित्तं ॥६३५॥ ॥ सभै पाइ लागो ॥ ॥ पतं द्रोह तयागो ॥ ॥ लगी धाइ पायं ॥ ॥ ॥ सभै नारि आयं ॥६३६॥ ॥ महा रूप जाने ॥ ॥ चितं चोर माने ॥ ॥ चुभे चित्र ऐसे ॥ ॥ ॥ सितं साइ कैसे ॥६३७॥ ॥ लगो हेम रूपं ॥ ॥ सभै भूप भूपं ॥ ॥ रंगे रंग नैणं ॥ ॥ ॥ छके देव गैणं ॥६३८॥ ॥ जिनै एक बारं ॥ ॥ लखे रावणारं ॥ ॥ रही मोहत ह्वै कै ॥ ॥ ॥ लुभी देख कै कै ॥६३९॥ ॥ छकी रूप रामं ॥ ॥ गए भूल धामं ॥ ॥ करयो राम बोधं ॥ ॥ ॥ महां जुद्ध जोधं ॥६४०॥ ॥ राम बाच मदोदरी प्रति ॥ ॥ रसावल छंद ॥ ॥ सुनो राज नारी ॥ ॥ कहा भूल हमारी ॥ ॥ चितं चित्त कीजै ॥ ॥ ॥ पुनर दोस दीजै ॥६४१॥ ॥ मिलै मोहि सीता ॥ ॥ चलै धरम गीता ॥ ॥ पठयो पउन पूतं ॥ ॥ ॥ हुतो अग्ग्र दूतं ॥६४२॥ ॥ चलयो धाइ कै कै ॥ ॥ सीआ सोध लै कै ॥ ॥ हुती बाग माही ॥ ॥ ॥ तरे ब्रिछ छाही ॥६४३॥ ॥ परयो जाइ पायं ॥ ॥ सुनो सीअ मायं ॥ ॥ रिपं राम मारे ॥ ॥ ॥ खरे तोहि दुआरे ॥६४४॥ ॥ चलो बेग सीता ॥ ॥ जहा राम जीता ॥ ॥ सभै सत्रु मारे ॥ ॥ ॥ भूअं भार उतारे ॥६४५॥ ॥ चली मोद कै कै ॥ ॥ हनू संग लै कै ॥ ॥ सीआ राम देखे ॥ ॥ ॥ उही रूप लेखे ॥६४६॥ ॥ लगी आन पायं ॥ ॥ लखी राम रायं ॥ ॥ कहयो कउल नैनी ॥ ॥ ॥ बिधुं बाक बैनी ॥६४७॥ ॥ धसो अग्ग मद्धं ॥ ॥ तबै होइ सुद्धं ॥ ॥ लई मान सीसं ॥ ॥ ॥ रचयो पावकीसं ॥६४८॥ ॥ गई पैठ ऐसे ॥ ॥ घनं बिज्ज जैसे ॥ ॥ स्रुतं जेम गीता ॥ ॥ ॥ मिली तेम सीता ॥६४९॥ ॥ धसी जाइ कै कै ॥ ॥ कढी कुंदन ह्वै कै ॥ ॥ गरै राम लाई ॥ ॥ ॥ कबं क्रित गाई ॥६५०॥ ॥ सभो साध मानी ॥ ॥ तिहू लोग जानी ॥ ॥ बजे जीत बाजे ॥ ॥ ॥ तबै राम गाजे ॥६५१॥ ॥ लई जीत सीता ॥ ॥ महां सुभ्र गीता ॥ ॥ सभै देव हरखे ॥ ॥ ॥ नभं पुहप बरखे ॥६५२॥ ॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामवतार बभीछन को लंका को राज दीबो मदोदरी समोध कीबो सीता मिलबो धयाइ समापतं ॥१८॥
॥ अथ अउधपुरी को चलबो कथनं ॥ ॥ रसावल छंद ॥ ॥ तबै पुहपु पै कै ॥ ॥ चड़े जुद्ध जै कै ॥ ॥ सभै सूर गाजै ॥ ॥ ॥ जयं गीत बाजे ॥६५३॥ ॥ चले मोद ह्वै कै ॥ ॥ कपी बाहन लै कै ॥ ॥ पुरी अउध पेखी ॥ ॥ ॥ स्रुतं सुरग लेखी ॥६५४॥ ॥ मकरा छंद ॥ ॥ सीअ लै सीएस आए ॥ ॥ मंगल सु चार गाए ॥ ॥ आनंद हीए बढाए ॥ ॥ ॥ सहरो अवध जहां रे ॥६५५॥ ॥ धाई लुगाई आवै ॥ ॥ भीरो न बार पावै ॥ ॥ आकल खरे उघावै ॥ ॥ ॥ भाखैं ढोलन कहां रे ॥६५६॥ ॥ जुलफै अनूप जां की ॥ ॥ नागन कि सिआह बांकी ॥ ॥ अधभुत अदाइ तां की ॥ ॥ ॥ ऐसो ढोलन कहां है ॥६५७॥ ॥ सरवोस ही चमनरा ॥ ॥ पर चुसत जां वतनरा ॥ ॥ जिन दिल हरा हमारा ॥ ॥ ॥ वह मन हरन कहां है ॥६५८॥ ॥ चित को चुराइ लीना ॥ ॥ जालम फिराक दीना ॥ ॥ जिन दिल हरा हमारा ॥ ॥ ॥ वह गुल चिहर कहां है ॥६५९॥ ॥ कोऊ बताइ दै रे ॥ ॥ चाहो सु आन लै रे ॥ ॥ जिन दिल हरा हमारा ॥ ॥ ॥ वह मन हरन कहां है ॥६६०॥ ॥ माते मनो अमल के ॥ ॥ हरीआ कि जा वतन के ॥ ॥ आलम कुसाइ खूबी ॥ ॥ ॥ वह गुल चिहर कहां है ॥६६१॥ ॥ जालम अदाइ लीए ॥ ॥ खंजन खिसान कीए ॥ ॥ जिन दिल हरा हमारा ॥ ॥ ॥ वह महबदन कहां है ॥६६२॥ ॥ जालम अदाए लीने ॥ ॥ जानुक सराब पीने ॥ ॥ रुखसर जहान ताबां ॥ ॥ ॥ वह गुलबदन कहां है ॥६६३॥ ॥ जालम जमाल खूबी ॥ ॥ रोसन दिमाग अखसर ॥ ॥ पुर चुसत जां जिगर रा ॥ ॥ ॥ वह गुल चिहर कहां है ॥६६४॥ ॥ बालम बिदेस आए ॥ ॥ जीते जुआन जालम ॥ ॥ कामल कमाल सूरत ॥ ॥ ॥ वर गुल चिहर कहां है ॥६६५॥ ॥ रोसन जहान खूबी ॥ ॥ जाहर कलीम हफत जि ॥ ॥ आलम खुसाइ जलवा ॥ ॥ ॥ वह गुल चिहर कहां है ॥६६६॥ ॥ जीते बजंग जालम ॥ ॥ कीन खतंग पररा ॥ ॥ पुहपक बिबान बैठे ॥ ॥ ॥ सीता रवन कहां है ॥६६७॥ ॥ मादर खुसाल खातर ॥ ॥ कीने हजार छावर ॥ ॥ मातुर सिता बधाई ॥ ॥ ॥ वह गुल चिहर कहां है ॥६६८॥ ॥ इति स्री राम अवतार सीता अयुधिआ आगम नाम धिआइ समापतं ॥
॥ अथ माता मिलणं ॥ ॥ रसावल छंद ॥ ॥ सुने राम आए ॥ ॥ सभै लोग धाए ॥ ॥ लगे आन पायं ॥ ॥ ॥ मिले राम रायं ॥६६९॥ ॥ कोऊ चउर ढारैं ॥ ॥ कोऊ पान खुआरैं ॥ ॥ परे मात पायं ॥ ॥ ॥ लए कंठ लायं ॥६७०॥ ॥ मिलै कंठ रोवैं ॥ ॥ मनो सोक धोवैं ॥ ॥ करैं बीर बातैं ॥ ॥ ॥ सुने सरब मातैं ॥६७१॥ ॥ मिलै लच्छ मातं ॥ ॥ परे पाइ भ्रातं ॥ ॥ करियो दान एतो ॥ ॥ ॥ गनै कउन केतो ॥६७२॥ ॥ मिले भरथ मातं ॥ ॥ कही सरब बातं ॥ ॥ धनं मात तो को ॥ ॥ ॥ अरिणी कीन मो को ॥६७३॥ ॥ कहा दोस तेरै ॥ ॥ लिखी लेख मेरै ॥ ॥ हुनी हो सु होई ॥ ॥ ॥ कहै कउन कोई ॥६७४॥ ॥ करो बोध मातं ॥ ॥ मिलयो फेरि भ्रातं ॥ ॥ सुनयो भरथ धाए ॥ ॥ ॥ पगं सीस लाए ॥६७५॥ ॥ भरे राम अंकं ॥ ॥ मिटी सरब संकं ॥ ॥ मिलयं सत्र हंता ॥ ॥ ॥ सरं सासत्र गंता ॥६७६॥ ॥ जटं धूर झारी ॥ ॥ पगं राम रारी ॥ ॥ करी राज अरचा ॥ ॥ ॥ दिजं बेद चरचा ॥६७७॥ ॥ करैं गीत गानं ॥ ॥ भरे वीर मानं ॥ ॥ दीयं राम राजं ॥ ॥ ॥ सरे सरब काजं ॥६७८॥ ॥ बुलै बिप्प लीने ॥ ॥ स्रुत्तोचार कीने ॥ ॥ भए राम राजा ॥ ॥ ॥ बजे जीत बाजा ॥६७९॥ ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ ॥ चहूं चक्क के छत्रधारी बुलाए ॥ ॥ धरे अत्र नीके पुरी अउध आए ॥ ॥ गहे राम पायं परम प्रीत कै कै ॥ ॥ ॥ मिले चत्र देसी बडी भेट दै कै ॥६८०॥ ॥ दए चीन माचीन चीनंत देसं ॥ ॥ महां सुंद्री चेरका चार केसं ॥ ॥ मनं मानकं हीर चीरं अनेकं ॥ ॥ ॥ कीए खेज प्ईयै कहूं एक एकं ॥६८१॥ ॥ मनं मुत्तीयं मानकं बाज राजं ॥ ॥ दए दंतपंती सजे सरब साजं ॥ ॥ रथं बेसटं हीर चीरं अनंतं ॥ ॥ ॥ मनं मानकं बद्ध रद्धं दुरंतं ॥६८२॥ ॥ किते स्वेत ऐरावतं तुल्लि दंती ॥ ॥ दए मुत्तयं साज सज्जे सुपंती ॥ ॥ किते बाज राजं जरी जीन संगं ॥ ॥ ॥ नचै नट्ट मानो मचे जंग रंगं ॥६८३॥ ॥ किते प्खरे पील राजा प्रमाणं ॥ ॥ दए बाज राजी सिराजी न्रिपाणं ॥ ॥ दई रकत नीलं मणी रंग रंगं ॥ ॥ ॥ लखयो राम को अत्र धारी अभंगं ॥६८४॥ ॥ किते पसम पाट्मबरं स्वरण बरणं ॥ ॥ मिले भेट लै भांति भांतं अभरणं ॥ ॥ किते परम पाट्मबरं भान तेजं ॥ ॥ ॥ दए सीअ धामं सभो भोज भोजं ॥६८५॥ ॥ किते भूखणं भान तेजं अनंतं ॥ ॥ पठे जानकी भेट दै दै दुरंतं ॥ ॥ घने राम मातान की भेट भेजे ॥ ॥ ॥ हरे चित्त के जाहि हेरे कलेजे ॥६८६॥ ॥ घमं चक्र चक्क्रं फिरी राम दोही ॥ ॥ मनो बयोत बागो तिमं सीअ सोही ॥ ॥ पठै छत्र दै दै छितं छोण धारी ॥ ॥ ॥ हरे सरब गरबं करे पुरब भारी ॥६८७॥
॥ कटयो काल एवं भए राम राजं ॥ ॥ फिरी आन रामं सिरं सरब राजं ॥ ॥ फिरियो जैत पत्रं सिरं सेत छत्रं ॥ ॥ ॥ करे राज आगिआ धरै बीर अत्रं ॥६८८॥ ॥ दयो एक एकं अनेकं प्रकारं ॥ ॥ लखे सरब लोकं सही रावणारं ॥ ॥ सही बिसन देवारदन द्रोह हरता ॥ ॥ ॥ चहूं चक्क जानयो सीआ नाथ भरता ॥६८९॥ ॥ सही बिसन अउतार कै ताहि जानयो ॥ ॥ सभो लोक खयाता बिधाता पछानयो ॥ ॥ फिरी चार चक्क्रं चतुर चक्क्र धारं ॥ ॥ ॥ भयो चक्क्रवरती भूअं रावणारं ॥६९०॥ ॥ लखयो परम जोगिंद्रणो जोग रूपं ॥ ॥ महादेव देवं लखयो भूप भूपं ॥ ॥ महा सत्र सत्रं महां साध साधं ॥ ॥ ॥ महां रूप रूपं लखयो बयाध बाधं ॥६९१॥ ॥ त्रीयं देव तुल्लं नरं नार नाहं ॥ ॥ महां जोध जोधं महां बाह बाहं ॥ ॥ स्रुतं बेद करता गणं रुद्र रूपं ॥ ॥ ॥ महां जोग जोगं महां भूप भूपं ॥६९२॥ ॥ परं पारगंता सिवं सिद्ध रूपं ॥ ॥ बुधं बुद्धि दाता रिधं रिद्ध कूपं ॥ ॥ जहां भाव कै जेण जैसो बिचारे ॥ ॥ ॥ तिसी रूप सौ तउन तैसे निहारे ॥६९३॥ ॥ सभो ससत्रधारी लहे ससत्र गंता ॥ ॥ दुरे देव द्रोही लखे प्राण हंता ॥ ॥ जिसी भाव सो जउन जैसे बिचारे ॥ ॥ ॥ तिसी रंग कै काछ काछे निहारे ॥६९४॥ ॥ अनंत तुका भुजंग प्रयात छंद ॥ ॥ कितो काल बीतिओ भयो राम राजं ॥ ॥ सभै सत्र जीते महा जुद्ध माली ॥ ॥ फिरयो चक्क्र चारो दिसा मद्ध रामं ॥ ॥ ॥ भयो नाम ता ते महां चक्क्रवरती ॥६९५॥ ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ ॥ सभै बिप्प आगसत ते आदि लै कै ॥ ॥ भ्रिगं अंगुरा बिआस ते लै बिसिसटं ॥ ॥ बिस्वामित्र अउ बालमीकं सु अत्रं ॥ ॥ ॥ दुरबासा सभै कसप ते आद लै कै ॥६९६॥ ॥ जभै राम देखै सभै बिप्प आए ॥ ॥ परयो धाइ पायं सीआ नाथ जगतं ॥ ॥ दयो आसनं अरघु पाद रघु तेणं ॥ ॥ ॥ दई आसिखं मौननेसं प्रसिंनयं ॥६९७॥ ॥ भई रिख रामं बडी गिआन चरचा ॥ ॥ कहो सरब जौपै बढै एक ग्रंथा ॥ ॥ बिदा बिप्प्र कीने घनी दच्छना दै ॥ ॥ ॥ चले देस देसं महां चित्त हरखं ॥६९८॥ ॥ इही बीच आयो म्रितं सून बिप्पं ॥ ॥ जीऐ बाल आजै नही तोहि स्रापं ॥ ॥ सभै राम जानी चितं ताहि बाता ॥ ॥ ॥ दिसं बारणी ते बिबाणं हकारयो ॥६९९॥ ॥ हुतो एक सूद्रं दिसा उत्र मद्धं ॥ ॥ झुलै कूप मद्धं परयो औध मुक्खं ॥ ॥ महां उग्र ते जाप पसयात उग्रं ॥ ॥ ॥ हनयो ताहि रामं असं आप हत्थं ॥७००॥
॥ जीयो ब्रहम पुत्रं हरयो ब्रहम सोगं ॥ ॥ बढी कीरत रामं चतुर कुंट मद्धं ॥ ॥ करयो दस सहंस्र लउ राज अउधं ॥ ॥ ॥ फिरी चक्र चारो बिखै राम दोही ॥७०१॥ ॥ जिणे देस देसं नरेसं त रामं ॥ ॥ महां जुद्ध जेता तिहूं लोक जानयो ॥ ॥ दयो मंत्री अत्रं महाभ्रात भरथं ॥ ॥ ॥ कीयो सैन नाथं सुमित्रा कुमारं ॥७०२॥ ॥ म्रितगत छंद ॥ ॥ सुमति महा रिख रघुबर ॥ ॥ दुंदभ बाजति दर दर ॥ ॥ जग कीअस धुन घर घर ॥ ॥ ॥ पूर रही धुन सुरपुर ॥७०३॥ ॥ सुढर महा रघुनंदन ॥ ॥ जगपत मुन गन बंदन ॥ ॥ धरधर लौ नर चीने ॥ ॥ ॥ सुख दै दुख बिन कीने ॥७०४॥ ॥ अर हर नर कर जाने ॥ ॥ दुख हर सुख कर माने ॥ ॥ पुर धर नर बरसे है ॥ ॥ ॥ रूप अनूप अभै है ॥७०५॥ ॥ अनका छंद ॥ ॥ प्रभू है ॥ ॥ अजू है ॥ ॥ अजै है ॥ ॥ ॥ अभै है ॥७०६॥ ॥ अजा है ॥ ॥ अता है ॥ ॥ अलै है ॥ ॥ ॥ अजै है ॥७०७॥ ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ ॥ बुलयो चत्र भ्रातं सुमित्रा कुमारं ॥ ॥ करयो माथुरेसं तिसे रावणारं ॥ ॥ तहां एक दईतं लवं उग्र तेजं ॥ ॥ ॥ दयो ताहि अप्पं सिवं सूल भेजं ॥७०८॥ ॥ पठयो तीर मंत्रं दीयो एक रामं ॥ ॥ महां जुद्ध माली महां धरम धामं ॥ ॥ सिवं सूल हीणं जवै सत्र जानयो ॥ ॥ ॥ तबै संगि ता कै महां जुद्ध ठानयो ॥७०९॥ ॥ लयो मंत्र तीरं चलयो निआइ सीसं ॥ ॥ त्रिपुर जुद्ध जेता चलयो जाण ईसं ॥ ॥ लखयो सूल हीणं रिपं जउण कालं ॥ ॥ ॥ तबै कोप मंडयो रणं बिकरालं ॥७१०॥ ॥ भजै घाइ खायं अगायंत सूरं ॥ ॥ हसे कंक बंकं घुमी गैण हूरं ॥ ॥ उठे टोप टुक्कं कमाणं प्रहारे ॥ ॥ ॥ रणं रोस रज्जे महां छत्र धारे ॥७११॥ ॥ फिरयो अप दईतं महा रोस कै कै ॥ ॥ हणे राम भ्रातं वहै बाण लै कै ॥ ॥ रिपं नास हेतं दीयो राम अप्पं ॥ ॥ ॥ हणियो ताहि सीसं द्रुगा जाप जप्पं ॥७१२॥ ॥ गिरयो झूम भूमं अघूमयो अरि घायं ॥ ॥ हणयो सत्र हंता तिसै चउप चायं ॥ ॥ गणं देव हरखे प्रबरखंत फूलं ॥ ॥ ॥ हतयो दैत द्रोही मिटयो सरब सूलं ॥७१३॥ ॥ लवं नासुरैयं लवं कीन नासं ॥ ॥ सभै संत हरखे रिपं भे उदासं ॥ ॥ भजै प्रान लै लै तजयो नगर बासं ॥ ॥ ॥ करयो माथुरेसं पुरीवा नवासं ॥७१४॥ ॥ भयो माथुरेसं लवंनास्र हंता ॥ ॥ सभै ससत्र गामी सुभं ससत्र गंता ॥ ॥ भए दुसट दूरं करूरं सु ठामं ॥ ॥ ॥ करयो राज तैसो जिमं अउध रामं ॥७१५॥ ॥ करियो दुसट नासं पपातंत सूरं ॥ ॥ उठी जै धुनं पुर रही लोग पूरं ॥ ॥ गई पार सिंधं सु बिंधं प्रहारं ॥ ॥ ॥ सुनियो चक्क्र चारं लवं लावणारं ॥७१६॥
॥ अथ सीता को बनबास दीबो ॥ ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ ॥ भई एम तउनै इतै रावणारं ॥ ॥ कही जानकी सो सुकत्थं सुधारं ॥ ॥ रचे एक बागं अभिरामं सु सोभं ॥ ॥ ॥ लखे नंदनं जउन की क्रांत छोभं ॥७१७॥ ॥ सुनी एम बानी सीआ धरम धामं ॥ ॥ रचियो एक बागं महां अभरामं ॥ ॥ मणी भूखितं हीर चीरं अनंतं ॥ ॥ ॥ लखे इंद्र प्थं लजे स्रोभ वंतं ॥७१८॥ ॥ मणी माल बज्रं ससोभाइ मानं ॥ ॥ सभै देव देवं दुती सुरग जानं ॥ ॥ गए राम ता मो सीआ संग लीने ॥ ॥ ॥ किती कोट सुंदरी सभै संगि कीने ॥७१९॥ ॥ रचयो एक मंद्रं महा सुभ्र ठामं ॥ ॥ करयो राम सैनं तहां धरम धामं ॥ ॥ करी केल खेलं सु बेलं सु भोगं ॥ ॥ ॥ हुतो जउन कालं समै जैस जोगं ॥७२०॥ ॥ रहयो सीअ गरभं सुनयो सरब बामं ॥ ॥ कहे एम सीता पुनर बैन रामं ॥ ॥ फिरयो बाग बागं बिदा नाथ दीजै ॥ ॥ ॥ सुनो प्रान पिआरे इहै काज कीजै ॥७२१॥ ॥ दीयौ राम संगं सुमित्रा कुमारं ॥ ॥ दई जानकी संग ता के सुधारं ॥ ॥ जहां घोर सालं तमालं बिक्रालं ॥ ॥ ॥ तहां सीअ को छोर आइयो उतालं ॥७२२॥ ॥ बनं निरजनं देख कै कै अपारं ॥ ॥ बन्मबास जानयो दयो रावणारं ॥ ॥ रुरोदं सुर उच्चं पपातंत प्रानं ॥ ॥ ॥ रणं जेम वीरं लगे मरम बानं ॥७२३॥ ॥ सुनी बालमीकं स्रुतं दीन बानी ॥ ॥ चलयो कउक चित्तं तजी मोन धानी ॥ ॥ सीआ संगि लीने गयो धाम आपं ॥ ॥ ॥ मनो बच्च करमं दुरगा जाप जापं ॥७२४॥ ॥ भयो एक पुत्रं तहां जानकी तै ॥ ॥ मनो राम कीनो दुती राम ते लै ॥ ॥ वहै चार चिहनं वहै उग्ग्र तेजं ॥ ॥ ॥ मनो अप्प अंसं दुती काढि भेजं ॥७२५॥ ॥ दीयो एक पालं सु बालं रिखीसं ॥ ॥ लसै चंद्र रूपं किधो दयोस ईसं ॥ ॥ गयो एक दिवसं रिखी संधियानं ॥ ॥ ॥ लयो बाल संगं गई सीअ नानं ॥७२६॥ ॥ रही जात सीता महां मोन जागे ॥ ॥ बिनां बाल पालं लखयो सोकु पागे ॥ ॥ कुसा हाथ लै कै रचयो एक बालं ॥ ॥ ॥ तिसी रूप रंगं अनूपं उतालं ॥७२७॥ ॥ फिरी नाइ सीता कहा आन देखयो ॥ ॥ उही रूप बालं सुपालं बसेखयो ॥ ॥ क्रिपा मोन राजं घनी जान कीनो ॥ ॥ ॥ दुती पुत्र ता ते क्रिपा जान दीनो ॥७२८॥ ॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामवतार दुइ पुत्र उतपंने धयाइ धयाइ समापतं ॥२१॥
॥ अथ जग्यार्मभ कथनं ॥ ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ ॥ उतै बाल पालै इतै अउध राजं ॥ ॥ बुले बिप्प जगयं तजयो एक बाजं ॥ ॥ रिपं नास हंता दयो संग ता कै ॥ ॥ ॥ बडी फउज लीने चलयो संग वा कै ॥७२९॥ ॥ फिरयो देस देसं नरेसाण बाजं ॥ ॥ किनी नाहि बाधयो मिले आन राजं ॥ ॥ महां उग्र धनियां बडी फउज लै कै ॥ ॥ ॥ परे आन पायं बडी भेट दै कै ॥७३०॥ ॥ दिसा चार जीती फिरयो फेरि बाजी ॥ ॥ गयो बालमीकं रिखिसथान ताजी ॥ ॥ जबै भाल पत्रं लवं छोर बाचयो ॥ ॥ ॥ बडो उग्रधंनया रसं रुद्र राचयो ॥७३१॥ ॥ ब्रिछं बाज बांधयो लखयो ससत्र धारी ॥ ॥ बडो नाद कै सरब सैना पुकारी ॥ ॥ कहा जात रे बाल लीने तुरंगं ॥ ॥ ॥ तजो नाहि या को सजो आन जंगं ॥७३२॥ ॥ सुणयो नाम जुद्धं जबै स्रउण सूरं ॥ ॥ महा ससत्र सउडी महां लोह पूरं ॥ ॥ हठे बीर हाठै सभै ससत्र लै कै ॥ ॥ ॥ परयो मद्धि सैणं बडो नादि कै कै ॥७३३॥ ॥ भली भांत मारै पचारे सु सूरं ॥ ॥ गिरे जुद्ध जोधा रही धूर पूरं ॥ ॥ उठी ससत्र झारं अपारंत वीरं ॥ ॥ ॥ भ्रमे रुंड मुंड तनं तच्छ तीरं ॥७३४॥ ॥ गिरे लुत्थ प्थं सु जुत्थत बाजी ॥ ॥ भ्रमै छूछ हाथी बिना सुआर ताजी ॥ ॥ गिरे ससत्र हीणं बिअसत्रंत सूरं ॥ ॥ ॥ हसे भूत प्रेतं भ्रमी गैण हूरं ॥७३५॥ ॥ घणं घोर नीसाण बज्जे अपारं ॥ ॥ खहे वीर धीरं उठी ससत्र झारं ॥ ॥ छले चार चित्रं बचित्रंत बाणं ॥ ॥ ॥ रणं रोस रज्जे महां तेजवाणं ॥७३६॥ ॥ चाचरी छंद ॥ ॥ उठाई ॥ ॥ दिखाई ॥ ॥ नचाई ॥ ॥ ॥ चलाई ॥७३७॥ ॥ भ्रमाई ॥ ॥ दिखाई ॥ ॥ क्मपाई ॥ ॥ ॥ चखाई ॥७३८॥ ॥ कटारी ॥ ॥ अपारी ॥ ॥ प्रहारी ॥ ॥ ॥ सुनारी ॥७३९॥ ॥ पचारी ॥ ॥ प्रहारी ॥ ॥ हकारी ॥ ॥ ॥ कटारी ॥७४०॥ ॥ उठाए ॥ ॥ गिराए ॥ ॥ भगाए ॥ ॥ ॥ दिखाए ॥७४१॥ ॥ चलाए ॥ ॥ पचाए ॥ ॥ त्रसाए ॥ ॥ ॥ चुटआए ॥७४२॥ ॥ इति लव बाधवो सत्रुघण बधहि समापत ॥ ॥ अथ लछमन जुध कथनं ॥ ॥ अणका छंद ॥ ॥ जब सर लागे ॥ ॥ तब सभ भागे ॥ ॥ दलपति मारे ॥ ॥ ॥ भट भटकारे ॥७४३॥ ॥ हय तज भागे ॥ ॥ रघुबर आगे ॥ ॥ बहु बिध रोवैं ॥ ॥ ॥ समुहि न जोवैं ॥७४४॥ ॥ लव अर मारे ॥ ॥ तव दल हारे ॥ ॥ द्वै सिस जीते ॥ ॥ ॥ नह भय भीते ॥७४५॥ ॥ लछमन भेजा ॥ ॥ बहु दल लेजा ॥ ॥ जिन सिस मारू ॥ ॥ ॥ मोहि दिखारू ॥७४६॥
॥ सुण लहु भ्रातं ॥ ॥ रघुबर बातं ॥ ॥ सजि दल चल्लयो ॥ ॥ ॥ जल थल हल्लयो ॥७४७॥ ॥ उठ दल धूरं ॥ ॥ नभ झड़ पूरं ॥ ॥ चहू दिस ढूके ॥ ॥ ॥ हरि हरि कूके ॥७४८॥ ॥ बरखत बाणं ॥ ॥ थिरकत जुआणं ॥ ॥ लह लह धुजणं ॥ ॥ ॥ खहखह भुजणं ॥७४९॥ ॥ हसि हसि ढूके ॥ ॥ कसि कसि कूके ॥ ॥ सुण सुण बालं ॥ ॥ ॥ हठि तज उतालं ॥७५०॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ हम नही तयागत बाज बर सुणि लछमना कुमार ॥ ॥ ॥ अपनो भर बल जुद्ध कर अब ही संक बिसार ॥७५१॥ ॥ अणका छंद ॥ ॥ लछमन गज्जयो ॥ ॥ बड धन सज्जयो ॥ ॥ बहु सर छोरे ॥ ॥ ॥ जणु घण ओरे ॥७५२॥ ॥ उत दिव देखैं ॥ ॥ धनु धनु लेखैं ॥ ॥ इत सर छोरे ॥ ॥ ॥ मस कण तूटैं ॥७५३॥ ॥ भट बर गाजैं ॥ ॥ दुंदभ बाजैं ॥ ॥ सरबर छोरैं ॥ ॥ ॥ मुख नह मोरैं ॥७५४॥ ॥ लछमन बाच सिस सो ॥ ॥ अणका छंद ॥ ॥ स्रिण स्रिण लरका ॥ ॥ जिन करु करखा ॥ ॥ दे मिलि घोरा ॥ ॥ ॥ तुहि बल थोरा ॥७५५॥ ॥ हठ तजि अईऐ ॥ ॥ जिन समुहईऐ ॥ ॥ मिलि मिलि मो को ॥ ॥ ॥ डर नहीं तो को ॥७५६॥ ॥ सिस नही मानी ॥ ॥ अति अभिमानी ॥ ॥ गहि धनु गज्जयो ॥ ॥ ॥ दु पग न भज्जयो ॥७५७॥ ॥ अजबा छंद ॥ ॥ रुद्धे रण भाई ॥ ॥ सर झड़ि लाई ॥ ॥ बरखे बाणं ॥ ॥ ॥ परखे जुआणं ॥७५८॥ ॥ डिग्गे रण मद्धं ॥ ॥ अद्धो अद्धं ॥ ॥ कट्टे अंगं ॥ ॥ ॥ रुझै जंगं ॥७५९॥ ॥ बाणन झड़ लायो ॥ ॥ सरब रसायो ॥ ॥ बहु अर मारे ॥ ॥ ॥ डील डरारे ॥७६०॥ ॥ डिग्गे रण भूमं ॥ ॥ नरबर घूमं ॥ ॥ रज्जे रण घायं ॥ ॥ ॥ चक्के चायं ॥७६१॥ ॥ अपूरब छंद ॥ ॥ गणे केते ॥ ॥ हणे जेते ॥ ॥ कई मारे ॥ ॥ ॥ किते हारे ॥७६२॥ ॥ सभै भाजे ॥ ॥ चितं लाजे ॥ ॥ भजे भै कै ॥ ॥ ॥ जीयं लै कै ॥७६३॥ ॥ फिरे जेते ॥ ॥ हणे केते ॥ ॥ किते घाए ॥ ॥ ॥ किते धाए ॥७६४॥ ॥ सिसं जीते ॥ ॥ भटं भीते ॥ ॥ महां क्रुद्धं ॥ ॥ ॥ कीयो जुद्धं ॥७६५॥ ॥ दोऊ भ्राता ॥ ॥ खगं खयाता ॥ ॥ महां जोधं ॥ ॥ ॥ मंडे क्रोधं ॥७६६॥ ॥ तजे बाणं ॥ ॥ धनं ताणं ॥ ॥ मचे बीरं ॥ ॥ ॥ भजे भीरं ॥७६७॥ ॥ कटे अंगं ॥ ॥ भजे जंगं ॥ ॥ रणं रुझे ॥ ॥ ॥ नरं जुझे ॥७६८॥ ॥ भजी सैनं ॥ ॥ बिना चैनं ॥ ॥ लछन बीरं ॥ ॥ ॥ फिरयो धीरं ॥७६९॥ ॥ इकै बाणं ॥ ॥ रिपं ताणं ॥ ॥ हणयो भालं ॥ ॥ ॥ गिरयो तालं ॥७७०॥ ॥ इति लछमन बधहि समापतं ॥
॥ अथ भरथ जुध कथनं ॥ ॥ अड़ूहा छंद ॥ ॥ भाग गयो दल त्राम कै कै ॥ ॥ लछमणं रण भूम दै कै ॥ ॥ खले रामचंद हुते जहां ॥ ॥ ॥ भट भाज भग्ग लगे तहां ॥७७१॥ ॥ जब जाइ बात कही उनै ॥ ॥ बहु भांत सोक दयो तिनै ॥ ॥ सुनि बैन मोन रहै बली ॥ ॥ ॥ जन चित्र पाहन की खली ॥७७२॥ ॥ पुन बैठ मंत्र बिचारयो ॥ ॥ तुम जाहु भरथ उचारयो ॥ ॥ मुन बाल द्वै जिन मारीयो ॥ ॥ ॥ धरि आन मोहि दिखारीयो ॥७७३॥ ॥ सज सैन भरथ चले तहां ॥ ॥ रण बाल बीर मंडे जहां ॥ ॥ बहु भात बीर संघारही ॥ ॥ ॥ सर ओघ प्रओघ प्रहारही ॥७७४॥ ॥ सुग्रीव और भभीछनं ॥ ॥ हनवंत अंगद रीछनं ॥ ॥ बहु भांति सैन बनाइ कै ॥ ॥ ॥ तिन पै चलयो समुहाइ कै ॥७७५॥ ॥ रण भूमि भरथ गए जबै ॥ ॥ मुन बाल दोइ लखे तबै ॥ ॥ दुइ काक पच्छा सोभही ॥ ॥ ॥ लखि देव दानो लोभही ॥७७६॥ ॥ भरथ बाच लव सो ॥ ॥ अकड़ा छंद ॥ ॥ मुनि बाल छाडहु गरब ॥ ॥ मिलि आन मोहू सरब ॥ ॥ लै जांहि राघव तीर ॥ ॥ ॥ तुहि नैक दै कै चीर ॥७७७॥ ॥ सुनते भरे सिस मान ॥ ॥ कर कोप तान कमान ॥ ॥ बहु भांति साइक छोरि ॥ ॥ ॥ जन अभ्र सावण ओर ॥७७८॥ ॥ लागे सु साइक अंग ॥ ॥ गिरगे सु बाह उतंग ॥ ॥ कहूं अंग भंग सुबाह ॥ ॥ ॥ कहूं चउर चीर सनाह ॥७७९॥ ॥ कहूं चित्र चार कमान ॥ ॥ कहूं अंग जोधन बान ॥ ॥ कहूं अंग घाइ भभक्क ॥ ॥ ॥ कहूं स्रोण सरत छलक्क ॥७८०॥ ॥ कहूं भूत प्रेत भकंत ॥ ॥ सु कहूं कमद्ध उठंत ॥ ॥ कहूं नाच बीर बैताल ॥ ॥ ॥ सो बमत डाकणि जुआल ॥७८१॥ ॥ रण घाइ घाए वीर ॥ ॥ सभ स्रोण भीगे चीर ॥ ॥ इक बीर भाजि चलंत ॥ ॥ ॥ इक आन जुद्ध जुटंत ॥७८२॥ ॥ इक ऐंच ऐंच कमान ॥ ॥ तक वीर मारत बान ॥ ॥ इक भाज भाज मरंत ॥ ॥ ॥ नही सुरग तउन बसंत ॥७८३॥ ॥ गज राज बाज अनेक ॥ ॥ जुझे न बाचा एक ॥ ॥ तब आन लंका नाथ ॥ ॥ ॥ जुझयो सिसन के साथ ॥७८४॥ ॥ बहोड़ा छंद ॥ ॥ लंकेस के उर मो तक बान ॥ ॥ मारयो राम सिसत जि कान ॥ ॥ तब गिरयो दानव सु भूमि मद्ध ॥ ॥ ॥ तिह बिसुध जाण नही कीयो बद्ध ॥७८५॥ ॥ तब रुकयो तास सुग्रीव आन ॥ ॥ कहा जात बाल नही पैस जान ॥ ॥ तब हणयो बाण तिह भाल तक्क ॥ ॥ ॥ तिह लगयो भाल मो रहयो चक्क ॥७८६॥ ॥ चप चली सैण कपणी सु क्रुद्ध ॥ ॥ नल नील हनू अंगद सु जुद्ध ॥ ॥ तब तीन तीन लै बाल बान ॥ ॥ ॥ तिह हणो भाल मो रोस ठान ॥७८७॥
॥ जो गए सूर सो रहे खेत ॥ ॥ जो बचे भाज ते हुइ अचेत ॥ ॥ तब तकि तकि सिस कसि बाण ॥ ॥ ॥ दल हतयो राघवी तजि काणि ॥७८८॥ ॥ अनूप नराज छंद ॥ ॥ सु कोपि देखि कै बलं सु क्रुद्ध राघवी सिसं ॥ ॥ बचित्र चित्रत सरं बबरख बरखणो रणं ॥ ॥ भभजि आसुरी सुतं उठंत भेकरी धुनं ॥ ॥ ॥ भ्रमंत कुंडली क्रितं पपीड़ दारणं सरं ॥७८९॥ ॥ घुमंत घाइलो घणं ततच्छ बाणणो बरं ॥ ॥ भभज कातरो कितं गजंत जोधणो जुद्धं ॥ ॥ चलंत तीछणो असं खिमंत धार उज्जलं ॥ ॥ ॥ पपात अंगद केसरी हनू व सुग्रिवं बलं ॥७९०॥ ॥ गिरंत आमुरं रणं भभरम आसुरी सिसं ॥ ॥ तजंत सुआमणो घरं भजंत प्रान ले भटं ॥ ॥ उठंत अंध धुंधणो कबंध बंधतं कटं ॥ ॥ ॥ लगंत बाणाणो बरं गिरंत भूमि अहवयं ॥७९१॥ ॥ पपात ब्रिछणं धरं बबेग मार तुज्जणं ॥ ॥ भरंत धूर भूरणं बमंत स्रोणतं मुखं ॥ ॥ चिकार चांवडी नभं फिकंत फिंकरी फिरं ॥ ॥ ॥ भकार भूत प्रेतणं डिकार डाकणी डुलं ॥७९२॥ ॥ गिरै धरं धुरं धरं धरा धरं धरं जिवं ॥ ॥ भभजि स्रउणतं तणै उठंत भै करी धुनं ॥ ॥ उठंत गद्द सद्दणं ननद्द निफिरं रणं ॥ ॥ ॥ बबरख साइकं सितं घुमंत जोधणो ब्रणं ॥७९३॥ ॥ भजंत भै धरं भटं बिलोक भरथणो रणं ॥ ॥ चलयो चिराइ कै चपी बबरख साइको सितं ॥ ॥ सु क्रुद्ध साइकं सिसं बबद्ध भालणो भटं ॥ ॥ ॥ पपात प्रिथवीयं हठी ममोह आस्र मंगतं ॥७९४॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामावतारे भरथ बधहि धिआइ समापतं ॥ अनूप नराज छंद ॥ भभजि भीतणो भटं ततजि भरथणो भूअं ॥ ॥ गिरंत लुत्थतं उठं रुरोद राघवं तटं ॥ ॥ जुझे सु भ्रात भरथणो सुणंत जानकी पतं ॥ ॥ ॥ पपात भूमिणो तलं अपीड़ पीड़तं दुखं ॥७९५॥ ॥ ससज्ज जोधणं जुधी सु क्रुद्ध बद्धणो बरं ॥ ॥ ततजि जग्ग मंडलं अदंड दंडणो नरं ॥ ॥ सु गज्ज बज्ज बाजणो उठंत भै धरी सुरं ॥ ॥ ॥ सनद्ध बद्ध खै दलं सबद्ध जोधणो बरं ॥७९६॥ ॥ चचक्क चांवडी नभं फिकंत फिंकरी धरं ॥ ॥ भखंत मास हारणं बमंत ज्वाल दुरगयं ॥ ॥ पुअंत पारबती सिरं नचंत ईसणो रणं ॥ ॥ ॥ भकंत भूत प्रेतणो बकंत बीर बैतलं ॥७९७॥ ॥ तिलका छंद ॥ ॥ जुट्टे वीरं ॥ ॥ छुट्टे तीरं ॥ ॥ फुट्टे अंगं ॥ ॥ ॥ तुट्टे तंगं ॥७९८॥ ॥ भग्गे वीरं ॥ ॥ लग्गे तीरं ॥ ॥ पिक्खे रामं ॥ ॥ ॥ धरमं धामं ॥७९९॥ ॥ जुझे जोधं ॥ ॥ मच्चे क्रोधं ॥ ॥ बंधो बालं ॥ ॥ ॥ बीर उतालं ॥८००॥
॥ ढुक्के फेर ॥ ॥ लिने घेर ॥ ॥ वीरैं बाल ॥ ॥ ॥ जिउ द्वैकाल ॥८०१॥ ॥ तज्जी काण ॥ ॥ मारे बाण ॥ ॥ डिग्गे वीर ॥ ॥ ॥ भग्गे धीर ॥८०२॥ ॥ कट्टे अंग ॥ ॥ डिग्गे जंग ॥ ॥ सुद्धं सूर ॥ ॥ ॥ भिने नूर ॥८०३॥ ॥ लक्खै नाहि ॥ ॥ भग्गे जाहि ॥ ॥ तज्जे राम ॥ ॥ ॥ धरमं धाम ॥८०४॥ ॥ अउरै भेस ॥ ॥ खुल्ले केस ॥ ॥ ससत्रं छोर ॥ ॥ ॥ दै दै कोर ॥८०५॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ दुहूं दिसन जोधा हरै परयो जुद्ध दुऐ जाम ॥ ॥ ॥ जूझ सकल सैना गई रहिगे एकल राम ॥८०६॥ ॥ तिहू भ्रात बिनु भै हनयो अर सभ दलहि संघार ॥ ॥ ॥ लव अरु कुस जूझन निमित लीनो राम हकार ॥८०७॥ ॥ सैना सकल जुझाइ कै कति बैठे छप जाइ ॥ ॥ ॥ अब हम सो तुमहूं लरो सुनि सुनि कउसल राइ ॥८०८॥ ॥ निरख बाल निज रूप प्रभ कहे बैन मुसकाइ ॥ ॥ ॥ कवन तात बालक तुमै कवन तिहारी माइ ॥८०९॥ ॥ अकरा छंद ॥ ॥ मिथला पुर राजा ॥ ॥ जनक सुभाजा ॥ ॥ तिह सिस सीता ॥ ॥ ॥ अति सुभ गीता ॥८१०॥ ॥ सो बनि आए ॥ ॥ तिह हम जाए ॥ ॥ हैं दुइ भाई ॥ ॥ ॥ सुनि रघुराई ॥८११॥ ॥ सुनि सीअ रानी ॥ ॥ रघुबर जानी ॥ ॥ चित पहिचानी ॥ ॥ ॥ मुख न बखानी ॥८१२॥ ॥ तिह सिस मानयो ॥ ॥ अति बल जानयो ॥ ॥ हठि रण कीनो ॥ ॥ ॥ कह नही दीनो ॥८१३॥ ॥ कसि सर मारे ॥ ॥ सिस नही हारे ॥ ॥ बहु बिधि बाणं ॥ ॥ ॥ अति धनु ताणं ॥८१४॥ ॥ अंग अंग बेधे ॥ ॥ सभ तन छेदे ॥ ॥ सभ दल सूझे ॥ ॥ ॥ रघुबर जूझे ॥८१५॥ ॥ जब प्रभ मारे ॥ ॥ सभ दल हारे ॥ ॥ बहु बिधि भागे ॥ ॥ ॥ दुऐ सिस आगे ॥८१६॥ ॥ फिरि न निहारैं ॥ ॥ प्रभू न चितारैं ॥ ॥ ग्रह दिसि लीना ॥ ॥ ॥ अस रण कीना ॥८१७॥ ॥ चौपई ॥ ॥ तब दुहूं बाल अयोधन देखा ॥ ॥ मनो रुद्र कीड़ा बनि पेखा ॥ ॥ काटि धुजन के ब्रिच्छ सवारे ॥ ॥ ॥ भूखन अंग अनूप उतारे ॥८१८॥ ॥ मूरछ भए सभ लए उठई ॥ ॥ बाज सहित तह गे जह माई ॥ ॥ देखि सीआ पति मुख रो दीना ॥ ॥ ॥ कहयो पूत बिधवा मुहि कीना ॥८१९॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामवतार लव बाज बांधवे राम बधह ॥
॥ अथ सीता ने सभ जीवाए कथनं ॥ ॥ सीता बाच पुत्रन सो ॥ ॥ चौपई ॥ ॥ अब मो कउ कासट दे आना ॥ ॥ जरउ लागि पहि होऊं मसाना ॥ ॥ सुनि मुनि राज बहुत बिधि रोए ॥ ॥ ॥ इन बालन हमरे सुख खोए ॥८२०॥ ॥ जब सीता तन चहा कि काढूं ॥ ॥ जोग अगनि उपराज सु छाडूं ॥ ॥ तब इम भई गगन ते बानी ॥ ॥ ॥ कहा भई सीता तै इयानी ॥८२१॥ ॥ अरूपा छंद ॥ ॥ सुनी बानी ॥ ॥ सीआ रानी ॥ ॥ लयो आनी ॥ ॥ ॥ करै पानी ॥८२२॥ ॥ सीता बाच मन मै ॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ जउ मन बच करमन सहित राम बिना नही अउर ॥ ॥ ॥ तउ ए राम सहित जीऐ कहयो सीआ तिह ठउर ॥८२३॥ ॥ अरूपा छंद ॥ ॥ सभै जागे ॥ ॥ भ्रमं भागे ॥ ॥ हठं तयागे ॥ ॥ ॥ पगं लागे ॥८२४॥ ॥ सीआ आनी ॥ ॥ जगं रानी ॥ ॥ धरम धानी ॥ ॥ ॥ सती मानी ॥८२५॥ ॥ मनं भाई ॥ ॥ उरं लाई ॥ ॥ सती जानी ॥ ॥ ॥ मनै मानी ॥८२६॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ बहु बिधि सीअहि समोध करि चले अजुधिआ देस ॥ ॥ ॥ लव कुस दोऊ पुत्रनि सहित स्री रघुबीर नरेस ॥८२७॥ ॥ चौपई ॥ ॥ बहुतु भांति कर सिसन समोधा ॥ ॥ सीय रघुबीर चले पुरि अउधा ॥ ॥ अनिक बेख से ससत्र सुहाए ॥ ॥ ॥ जानत तीन राम बन आए ॥८२८॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटके रामवतारे तिहू भिरातन सैना सहित जीबो ॥ ॥ सीता दुहू पुत्रन सहित पुरी अवध प्रवेस कथनं ॥ ॥ चौपई ॥ ॥ तिहूं मात कंठन सो लाए ॥ ॥ दोऊ पुत्र पाइन लपटाए ॥ ॥ बहुर आनि सीता पग परी ॥ ॥ ॥ मिट गई तहीं दुखन की घरी ॥८२९॥ ॥ बाज मेध पूरन कीअ जग्गा ॥ ॥ कउसलेस रघुबीर अभग्गा ॥ ॥ ग्रिह सपूत दो पूत सुहाए ॥ ॥ ॥ देस बिदेस जीत ग्रह आए ॥८३०॥ ॥ जेतिक कहे सु जग्ग बिधाना ॥ ॥ बिध पूरब कीने ते नाना ॥ ॥ एक घाट सत कीने जग्गा ॥ ॥ ॥ चट पट चक्र इंद्र उठि भग्गा ॥८३१॥ ॥ राजसुइ कीने दस बारा ॥ ॥ बाज मेधि इक्कीस प्रकारा ॥ ॥ गवाल्मभ अजमेध अनेका ॥ ॥ ॥ भूमि मद्ध करम कीए अनेका ॥८३२॥ ॥ नागमेध खट जग्ग कराए ॥ ॥ जउन करे जनमे जय पाए ॥ ॥ अउरै गनत कहां लग जाऊं ॥ ॥ ॥ ग्रंथ बढन ते हीए डराऊं ॥८३३॥ ॥ दस सहंस्र दस बरख प्रमाना ॥ ॥ राज करा पुर अउध निधाना ॥ ॥ तब लउ काल दसा नीअराई ॥ ॥ ॥ रघुबर सिरि म्रित डंक बजाई ॥८३४॥
॥ नमसकार तिह बिबिधि प्रकारा ॥ ॥ जिन जग जीत करयो बस सारा ॥ ॥ सभहन सीस डंक तिह बाजा ॥ ॥ ॥ जीत न सका रंक अरु राजा ॥८३५॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ जे तिन की सरनी परे कर दै लए बचाइ ॥ ॥ ॥ जौ नही कोऊ बाचिआ किसन बिसन रघुराइ ॥८३६॥ ॥ चौपई छंद ॥ ॥ बहु बिधि करो राज को साजा ॥ ॥ देस देस के जीते राजा ॥ ॥ साम दाम अरु दंड सभेदा ॥ ॥ ॥ जिह बिधि हुती सासना बेदा ॥८३७॥ ॥ बरन बरन अपनी क्रित लाए ॥ ॥ चार चार ही बरन चलाए ॥ ॥ छत्री करैं बिप्प्र की सेवा ॥ ॥ ॥ बैस लखै छत्री कह देवा ॥८३८॥ ॥ सूद्र सभन की सेव कमावै ॥ ॥ जह कोई कहै तही वह धावै ॥ ॥ जैसक हुती बेद सासना ॥ ॥ ॥ निकसा तैस राम की रसना ॥८३९॥ ॥ रावणादि रणि हांक संघारे ॥ ॥ भांति भांति सेवक गण तारे ॥ ॥ लंका दई टंक जनु दीनो ॥ ॥ ॥ इह बिधि राज जगत मै कीनो ॥८४०॥ ॥ दोहरा छंद ॥ ॥ बहु बरखन लउ राम जी राज करा अर टाल ॥ ॥ ॥ ब्रहमरंध्र कह फोर कै भयो कउसलिआ काल ॥८४१॥ ॥ चौपई ॥ ॥ जैस म्रितक के हुते प्रकारा ॥ ॥ तैसेई करे बेद अनुसारा ॥ ॥ राम सपूत जाहिं घर माही ॥ ॥ ॥ ताकहु तोट कोऊ कह नाही ॥८४२॥ ॥ बहु बिधि गति कीनी प्रभ माता ॥ ॥ तब लउ भई कैकई सांता ॥ ॥ ता के मरत सुमित्रा मरी ॥ ॥ ॥ देखहु काल क्रिआ कस करी ॥८४३॥ ॥ एक दिवस जानकि त्रिय सिखा ॥ ॥ भीत भए रावण कह लिखा ॥ ॥ जब रघुबर तिह आन निहारा ॥ ॥ ॥ कछुक कोप इम बचन उचारा ॥८४४॥ ॥ राम बाच मन मै ॥ ॥ या को कछु रावन सो होता ॥ ॥ ता ते चित्र चित्रकै देखा ॥ ॥ बचन सुनत सीता भई रोखा ॥ ॥ ॥ प्रभ मुहि अजहूं लगावत दोखा ॥८४५॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ जउ मेरे बच करम करि ह्रिदै बसत रघुराइ ॥ ॥ ॥ प्रिथी पैंड मुहि दीजीऐ लीजै मोहि मिलाइ ॥८४६॥ ॥ चौपई ॥ ॥ सुनत बचन धरनी फट गई ॥ ॥ लोप सीआ तिह भीतर भई ॥ ॥ चक्क्रत रहे निरख रघुराई ॥ ॥ ॥ राज करन की आस चुकाई ॥८४७॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ इह जगु धूअरो धउलहरि किह के आयो काम ॥ ॥ ॥ रघुबर बिनु सीअ ना जीऐ सीअ बिन जीऐ न राम ॥८४८॥ ॥ चौपई ॥ ॥ दुआरे कहयो बैठ लछमना ॥ ॥ पैठ न कोऊ पावै जना ॥ ॥ अंतहि पुरहि आप पगु धारा ॥ ॥ ॥ देहि छोरि म्रित लोक सिधारा ॥८४९॥
॥ दोहरा ॥ ॥ इंद्र मती हित अज न्रिपत जिम ग्रिह तज लीअ जोग ॥ ॥ ॥ तिम रघुबर तन को तजा स्री जानकी बियोग ॥८५०॥ ॥ इति स्री बचित्र नाटक रामवतारे सीता के हेत म्रित लोक से गए धिआइ समापतं ॥ ॥ अथ तीनो भ्राता त्रीअन सहित मरबो कथनं ॥ ॥ चौपई ॥ ॥ रउर परी सगरे पुर माही ॥ ॥ काहूं रही कछू सुध नाही ॥ ॥ नर नारी डोलत दुखिआरे ॥ ॥ ॥ जानुक गिरे जूझि जुझिआरे ॥८५१॥ ॥ सगर नगर महि पर गई रउरा ॥ ॥ बयाकुल गिरे हसत अरु घोरा ॥ ॥ नर नारी मन रहत उदासा ॥ ॥ ॥ कहा राम कर गए तमासा ॥८५२॥ ॥ भरथऊ जोग साधना साजी ॥ ॥ जोग अगन तन ते उपराजी ॥ ॥ ब्रहमरंध्र झट दै कर फोरा ॥ ॥ ॥ प्रभ सौ चलत अंग नही मोरा ॥८५३॥ ॥ सकल जोग के कीए बिधाना ॥ ॥ लछमन तजे तैस ही प्राना ॥ ॥ ब्रहमरंध्र लव अरि फुन फूटा ॥ ॥ ॥ प्रभ चरनन तर प्रान निखूटा ॥८५४॥ ॥ लव कुस दोऊ तहां चल गए ॥ ॥ रघुबर सीअहि जरावत भए ॥ ॥ अर पित भ्रात तिहूं कह दहा ॥ ॥ ॥ राज छत्र लव के सिर रहा ॥८५५॥ ॥ तिहूंअन की इसत्री तिह आई ॥ ॥ संगि सती ह्वै सुरग सिधाई ॥ ॥ लव सिर धरा राज का साजा ॥ ॥ ॥ तिहूंअन तिहूं कुंट कीअ राजा ॥८५६॥ ॥ उत्तर देस आपु कुस लीआ ॥ ॥ भरथ पुत्र कह पूरब दीआ ॥ ॥ दच्छन दीअ लच्छन के बाला ॥ ॥ ॥ पच्छम सत्रुघन सुत बैठाला ॥८५७॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ राम कथा जुग जुग अटल सभ कोई भाखत नेत ॥ ॥ ॥ सुरग बास रघुबर करा सगरी पुरी समेत ॥८५८॥ ॥ इति राम भिरात त्रीअन सहित सुरग गए अर सगरी पुरी सहित सुरग गए धिआइ समापतम ॥ ॥ चौपई ॥ ॥ जो इह कथा सुनै अरु गावै ॥ ॥ दूख पाप तिह निकटि न आवै ॥ ॥ बिसन भगति की ए फल होई ॥ ॥ ॥ आधि बयाधि छ्वै सकै न कोइ ॥८५९॥ ॥ समत सत्रह सहस पचावन ॥ ॥ हाड़ वदी प्रिथमै सुख दावन ॥ ॥ त्व प्रसादि करि ग्रंथ सुधारा ॥ ॥ ॥ भूल परी लहु लेहु सुधारा ॥८६०॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ नेत्र तुंग के चरन तर सतद्रव तीर तरंग ॥ ॥ ॥ स्री भगवत पूरन कीयो रघुबर कथा प्रसंग ॥८६१॥
॥ साध असाध जानो नही बाद सुबाद बिबादि ॥ ॥ ॥ ग्रंथ सकल पूरण कीयो भगवत क्रिपा प्रसादि ॥८६२॥ ॥ स्वैया ॥ ॥ पांइ गहे जब ते तुमरे तब ते कोऊ आंख तरे नही आनयो ॥ ॥ राम रहीम पुरान कुरान अनेक कहैं मत एक न मानयो ॥ ॥ सिम्रिति सासत्र बेद सभै बहु भेद कहै हम एक न जानयो ॥ ॥ ॥ स्री असिपान क्रिपा तुमरी करि मै न कहयो सभ तोहि बखानयो ॥८६३॥ ॥ दोहरा ॥ ॥ सगल दुआर कउ छाडि कै गहयो तुहारो दुआर ॥ ॥ ॥ बांहि गहे की लाज असि गोबिंद दास तुहार ॥८६४॥ ॥ इति स्री रामाइण समापतम सतु सुभम सतु ॥