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Martyrdom of Guru Teg Bahadur: Difference between revisions

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<b>तिलक जंञू राखा</b> प्रभ ता का ॥ कीनो बडो कलू महि साका ॥
<b>तिलक जंञू राखा</b> प्रभ ता का ॥ कीनो बडो कलू महि साका ॥
साधन हेति, इती जिनि करी ॥ <b>सीसु दीया</b>, परु सी न उचरी ॥१३॥
<b>साधन हेति</b>, इती जिनि करी ॥ <b>सीसु दीया</b>, परु सी न उचरी ॥१३॥
<b>धरम हेत</b> साका जिनि कीआ ॥ सीसु दीआ; <b>परु सिररु न दीआ</b> ॥
<b>धरम हेत</b> साका जिनि कीआ ॥ सीसु दीआ; <b>परु सिररु न दीआ</b> ॥
नाटक चेटक कीए कुकाजा ॥ प्रभ लोगन कह आवत लाजा ॥१४॥
नाटक चेटक कीए कुकाजा ॥ प्रभ लोगन कह आवत लाजा ॥१४॥

Revision as of 02:15, 25 November 2025

तिलक जंञू राखा प्रभ ता का ॥ कीनो बडो कलू महि साका ॥ साधन हेति, इती जिनि करी ॥ सीसु दीया, परु सी न उचरी ॥१३॥ धरम हेत साका जिनि कीआ ॥ सीसु दीआ; परु सिररु न दीआ ॥ नाटक चेटक कीए कुकाजा ॥ प्रभ लोगन कह आवत लाजा ॥१४॥

दोहरा ॥ ठीकर फोरि दिलीस सिरि; प्रभ पुरि कीया पयान ॥ तेग बहादुर सी क्रिआ; करी न किनहूं आनि ॥१५॥ तेग बहादुर के चलत; भयो जगत को सोक ॥ है है है सभ जग भयो; जै जै जै सुर लोकि ॥१६॥

गुरु गोबिंद सिंह जी

The Almighty preserved their tilak and sacred thread through the martyrdom of Guru Tegh Bahadur. In this Age, He accomplished a supreme act of martyrdom. He gave his head, yet not even a sigh of pain escaped. He who upheld DHARMA through this sacrifice. Gave the head but never compromised his principles (his inner Self remained unshaken).

Shattering the pot of the body upon the head of Delhi, He ascended to the Abode of Parmeshar.No other has ever performed such a deed as Tegh Bahadur did. When Tegh Bahadur departed, the world fell into sorrow. ‘Alas! Alas!’ cried the people of the world; ‘Victory! Victory!’ resounded in the Realms of the Enlightened Ones.”

Guru Gobind Singh Ji

ਤਿਲਕ ਜੰਞੂ ਰਾਖਾ ਪ੍ਰਭ ਤਾ ਕਾ ॥ ਕੀਨੋ ਬਡੋ ਕਲੂ ਮਹਿ ਸਾਕਾ ॥ ਸਾਧਨ ਹੇਤਿ ਇਤੀ ਜਿਨਿ ਕਰੀ ॥ ਸੀਸੁ ਦੀਯਾ ਪਰੁ ਸੀ ਨ ਉਚਰੀ ॥੧੩॥ ਧਰਮ ਹੇਤ ਸਾਕਾ ਜਿਨਿ ਕੀਆ ॥ ਸੀਸੁ ਦੀਆ ਪਰੁ ਸਿਰਰੁ ਨ ਦੀਆ ॥ ਨਾਟਕ ਚੇਟਕ ਕੀਏ ਕੁਕਾਜਾ ॥ ਪ੍ਰਭ ਲੋਗਨ ਕਹ ਆਵਤ ਲਾਜਾ ॥੧੪॥

ਦੋਹਰਾ ॥ ਠੀਕਰ ਫੋਰਿ ਦਿਲੀਸ ਸਿਰਿ ਪ੍ਰਭ ਪੁਰਿ ਕੀਯਾ ਪਯਾਨ ॥ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸੀ ਕ੍ਰਿਆ ਕਰੀ ਨ ਕਿਨਹੂੰ ਆਨਿ ॥੧੫॥ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਕੇ ਚਲਤ ਭਯੋ ਜਗਤ ਕੋ ਸੋਕ ॥ ਹੈ ਹੈ ਹੈ ਸਭ ਜਗ ਭਯੋ ਜੈ ਜੈ ਜੈ ਸੁਰ ਲੋਕਿ ॥੧੬॥